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Monday, May 25, 2026

डॉलर से भी सदियों पुराना, जान लें भारतीय रुपए का इतिहास

नई दिल्ली। भारतीय मुद्रा में अमेरिकी डॉलर के सामने ऐतिहासिक कमजोरी दर्ज की जा रही है, जिसका मुख्य कारण घरेलू शेयर बाजार में मची भारी उथल-पुथल है। वैश्विक निवेशक भारतीय वित्तीय बाजार से तेजी से अपना फंड वापस खींच रहे हैं। लगातार बिकवाली के दबाव में रुपया हाल ही में फिसलकर $95.70$ प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, हालांकि आज इसमें मामूली सुधार देखा गया।

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भारतीय रुपये (Indian Rupee) का इतिहास आधिकारिक तौर पर 16वीं शताब्दी से शुरू होता है। साल 1540 से 1545 के बीच दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले अफगान शासक शेरशाह सूरी ने देश की वित्तीय व्यवस्था को सुधारने के लिए एक नया सिक्का चलाया था। सूरी ने चांदी के इस सिक्के को जारी किया और इसे नाम दिया ‘रुपिया’। यह शब्द संस्कृत के ‘रुप्यकम्’ से लिया गया था, जिसका अर्थ होता है चांदी का सिक्का शेरशाह सूरी द्वारा शुरू की गई यह मुद्रा इतनी व्यावहारिक थी कि उनके बाद आए मुगल शासकों और फिर ब्रिटिश हुकूमत ने भी इसे जारी रखा।

अमेरिका ने अपनी आधिकारिक मुद्रा के रूप में डॉलर को बहुत बाद में अपनाया था। अमेरिकी कांग्रेस ने 6 जुलाई 1785 को आधिकारिक तौर पर डॉलर को अपने देश की राष्ट्रीय मुद्रा घोषित किया था। इस हिसाब से देखा जाए, तो शेरशाह सूरी का रुपया अमेरिकी डॉलर के वजूद में आने से लगभग 245 साल पहले ही भारत और उसके आसपास के व्यापारिक रूट पर मजबूती से दौड़ रहा था।

शेरशाह सूरी के शासनकाल में जो चांदी का रुपया जारी किया गया था, उसका वजन और शुद्धता बेहद सटीक हुआ करती थी। इस सिक्के का वजन 178 ग्रेन (लगभग 11.53 ग्राम) तय किया गया था, जिसमें 91.7 फीसदी तक शुद्ध चांदी मौजूद होती थी। इस सिक्के की बनावट और वजन की विश्वसनीयता इतनी ज्यादा थी कि आम जनता से लेकर विदेशी व्यापारियों तक ने इसे बिना किसी हिचकिचाहट के लेनदेन के लिए स्वीकार कर लिया। इसी मजबूती के कारण रुपया सदियों तक भारतीय उपमहाद्वीप की मुख्य पहचान बना रहा।

Tag: #nextindiatimes #IndianRupee #Dollar

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