डेस्क। भारतीय कानून में गुंडा सिर्फ कोई आरोपी व्यक्ति नहीं होता बल्कि ऐसा व्यक्ति होता है जिसे आदतन अपराधी या फिर सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा माना जाता है। कई राज्यों ने ऐसे लोगों से निपटने के लिए कानून बनाए हैं। उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 इसी का एक उदाहरण है। इन कानूनों का मकसद रोकथाम करना है।
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सबसे जरूरी शर्त यह है कि वह व्यक्ति आदतन अपराधी होना चाहिए। इसका मतलब है कि वह अकेले या फिर किसी गिरोह के हिस्से के तौर पर बार-बार आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा हो। सिर्फ एक घटना या कुछ मामले भी इस पैमाने को पूरा नहीं करते। हर तरह के अपराध के आधार पर किसी को अपने आप गुंडा (Gunda) घोषित नहीं किया जा सकता।
कानून आमतौर पर उन अपराधों पर ध्यान देता है जिनसे सार्वजनिक शांति भंग होती है या फिर सामाजिक डर पैदा होता है। इनमें मारपीट, अपराधिक धमकी, महिलाओं के साथ छेड़छाड़, हथियारों का अवैध कब्जा और ऐसे ही दूसरे काम शामिल हो सकते हैं जिनसे कानून व्यवस्था को खतरा पैदा होता है।

एक और जरूरी बात है डर का माहौल। अगर लोग अपनी जान या फिर माल को खतरे की वजह से किसी व्यक्ति के खिलाफ गवाही देने से डरते हैं तो इससे उस व्यक्ति को गुंडा घोषित करने का मामला और मजबूत हो जाता है। एक बार इन कानूनों के तहत आधिकारिक तौर पर गुंडा घोषित हो जाने के बाद सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। जिला मजिस्ट्रेट के पास जिला बदर का आदेश देने का अधिकार होता है। इसका मतलब है कि उस व्यक्ति को एक तय समय के लिए अक्सर 6 महीने तक के लिए जिला छोड़ने के लिए कहा जा सकता है।
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