डेस्क। चीनी की तरह प्याज की कीमतें (Onion Prices) भी आसमान छू रही हैं। पखवाड़ा भर पहले करीब 40 रुपये किलो वाला प्याज 60 रुपये किलो तक पहुंच गया है। फ़िलहाल भारत में प्याज केवल रसोई का हिस्सा नहीं बल्कि एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा रहा है। इस प्याज ने 1980 से लेकर 2013 तक कई राज्यों और केंद्र की सरकारों के बनने और बिगड़ने में अहम भूमिका निभाई है।
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साल 1975 में देश में आपातकाल लागू किया गया था, जिसके दो साल बाद 1977 में हुए चुनावों में कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली। जनता पार्टी गठबंधन ने 295 सीटें जीतकर सरकार बनाई और कांग्रेस महज 154 सीटों पर सिमट गई। हालांकि आंतरिक मतभेदों के कारण मोरारजी देसाई की जगह चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया था। सरकार पहले से ही सियासी खींचतान और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही थी कि इसी दौरान बाजार में प्याज के दाम 5 रुपये प्रति किलो के पार चले गए, जो उस जमाने के हिसाब से बहुत ज्यादा थे।

इंदिरा गांधी ने जनता के इस असंतोष को भांप लिया और इसे अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाया। इंदिरा गांधी ने रैलियों में प्याज की माला पहनकर उन्होंने जनता के सामने सवाल उठाया कि जो सरकार आम नागरिक को प्याज तक मुहैया न करा सके, उसकी क्या जरूरत है। 1980 के आम चुनाव में कांग्रेस ने प्याज की सस्ती दरों का वादा किया और 353 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की।
प्याज ने बिगाड़ा चुनावी गणित:
इतिहास ने 1998 में एक बार फिर खुद को दोहराया। दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्याज के दाम 50 से 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए। बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव से महज 52 दिन पहले साहिब सिंह वर्मा को हटाकर सुषमा स्वराज को दिल्ली की कमान सौंपी, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और विपक्ष ने प्याज को मुख्य चुनावी मुद्दा बना दिया।

नतीजतन, दिल्ली चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस की शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। इसी साल राजस्थान के विधानसभा चुनावों में भी प्याज की महंगाई का असर दिखा, जहां भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत को सत्ता से बाहर होना पड़ा। हार के बाद उन्होंने भी माना था कि प्याज की कीमतों ने उनके चुनावी गणित को बिगाड़ दिया। 1998 में केंद्र की एनडीए सरकार के दौर में भी प्याज की किल्लत पर सियासत गर्म रही, जिस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अपनी बात रखी थी।
जिस प्याज के मुद्दे के दम पर 1998 में कांग्रेस दिल्ली की सत्ता में आई थी, वही मुद्दा 2013 में उसकी विदाई का कारण बना। 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों से ठीक पहले प्याज के दाम फिर से आसमान छूने लगे। 15 सालों से मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित ने उस दौरान बयान भी दिया था कि बढ़ती दरों के कारण उन्होंने भिंडी के साथ प्याज खाना कम कर दिया है। हालांकि विपक्षी दलों ने बढ़ती कीमतों को प्रशासनिक विफलता करार दिया और दिसंबर 2013 के चुनावों में कांग्रेस की 15 साल पुरानी सरकार सत्ता से बाहर हो गई।
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