एंटरटेनमेंट डेस्क। हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग वो था जब पर्दे पर कलाकार जिस किरदार में ढलते थे, लोग उसे ही सच मान लेते थे। उस दौर में ना तो इंटरनेट की भागदौड़ थी और ना ही सोशल मीडिया का शोर था। यह वो दौर था जब सिनेमाई कहानियां आम जीवन से जुड़ाव रखती थीं। उस दौर में जब लोग पर्दे पर भगवान को देखते तो हाथ जोड़ लेते थे, उसी दौर में सिनेमा का एक ऐसा स्टार आया जिसे आम सुपरस्टार नहीं बल्कि ‘धार्मिक सुपरस्टार’ कहा गया।
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आज जिस सुपरस्टार (Actor) की हम बात कर रहे हैं, असल में वह कोई और नहीं बल्कि 50 और 60 के दशक के मशहूर अभिनेता महिपाल थे, जिनका पूरा नाम था महिपाल सिंह भंडारी। इनका जन्म 24 नवम्बर 1919 को जोधपुर, राजस्थान में हुआ। बचपन में ही इनकी मां का निधन हो गया था और इसके बाद इन्हें इनके दादाजी ने पाला।
महिपाल के दादाजी खूब कविताएं लिखा करते थे, तो ऐसे में उन्हीं से इसकी शिक्षा महिपाल ने प्राप्त की। महिपाल बचपन से ही साहित्य और अभिनय का शौक था। वह एक पढ़े-लिखे कलाकार थे और अपनी उर्दू-हिंदी की शुद्धता के लिए जाने जाते थे। जब महिपाल बड़े हुए तो उन्होंने सिनेमा का रुख किया और वह 1940 के दशक में मुंबई आए। उनकी पहली फिल्म 1942 में नजराना थी।

दरअसल ये देश की पहली मारवाड़ी फिल्म थी और इस फिल्म को बनाया जा रहा था तो उस दौर में ऐसी फिल्में कम बनती थीं। अलग-अलग भाषाओं पर तब फिल्में बनना शुरू ही हुई थीं। इसी बीच जब फिल्म के लिए महिपाल को चुना गया तो उनका परिवार इसके खिलाफ था। परिवार ने कहा कि अब भंडारी खानदान के लड़के तवायफों के साथ नाचेंगे मगर महिपाल ने दादाजी को मना लिया और दादाजी मान गए। इस तरह से देश की पहली मारवाड़ी फिल्म नजराना में महिपाल ने काम किया, जो हिंदी में भी बनी। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्म कंपनी ने 125 रुपए प्रति महीना पर रख लिया।
हालांकि उस दौर में ये रकम बड़ी थी। इसके बाद उन्होंने वी.शांताराम की फिल्म के लिए टाइटल गाना भी लिखा। इसके बाद वह कई स्टंट फिल्मों में नजर आए। हालांकि इन स्टंट फिल्मों से उन्हें वो स्टारडम नहीं मिला। महिपाल ने पर्दे पर अपनी यूएसपी ऐसे ही किरदारों में बना ली। वह ज्यादातर फिल्मों में या तो भगवान या भक्त के किरदार में नजर आए। उन्होंने करीब 30-35 ऐसी फिल्में की, जिनमें उनके ऐसे ही किरदार थे। उस दौर में महिपाल और अनीता गुहा की जोड़ी को परदे पर ‘राम-सीता’ का साक्षात रूप माना जाता था।
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