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सोमवार, अगस्त 17, 2026

दो बहनों की वो शर्त और फिर…जानें गरुड़ और नागों की दुश्मनी की कहानी

डेस्क। भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ और नागों (nag) को जन्मजात शत्रु माना जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दुश्मनी की शुरुआत किसी युद्ध से नहीं, बल्कि दो बहनों के बीच लगी एक शर्त से हुई थी? छल से जीती गई इस शर्त के कारण गरुड़ की माता को दासी बनना पड़ा और फिर अमृत कलश के लिए ऐसा संघर्ष हुआ, जिसने गरुड़ और नागों के बीच हमेशा के लिए बैर पैदा कर दिया।

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महाभारत के आदि पर्व में वर्णित कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्रियां विनता और कद्रू का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। दोनों बहनों ने महर्षि से संतान प्राप्ति का वरदान मांगा। कद्रू ने एक हजार शक्तिशाली पुत्रों की इच्छा जताई, जबकि विनता ने केवल दो ऐसे पुत्र मांगे, जो कद्रू के सभी पुत्रों से अधिक तेजस्वी और पराक्रमी हों। समय आने पर कद्रू के एक हजार अंडों से नागों का जन्म हुआ। इनमें शेषनाग, वासुकि और तक्षक जैसे शक्तिशाली नाग शामिल थे। विनता के पुत्र अरुण और गरुड़ हुए। अरुण आगे चलकर सूर्यदेव के सारथी बने, जबकि गरुड़ अपनी असाधारण शक्ति के कारण पक्षीराज कहलाए।

समुद्र मंथन से निकले दिव्य रत्नों में उच्चैःश्रवा नाम का एक अलौकिक सफेद घोड़ा भी था। एक दिन विनता और कद्रू ने इस घोड़े को देखा। कद्रू ने कहा कि घोड़े का शरीर सफेद है, लेकिन उसकी पूंछ काली है। विनता ने उत्तर दिया कि घोड़ा सिर से लेकर पूंछ तक पूरी तरह सफेद है। बात बढ़ी तो दोनों के बीच शर्त लग गई, जिसका उत्तर गलत निकलेगा, वह दूसरी की दासी बनेगी। कद्रू जानती थीं कि घोड़े की पूंछ भी सफेद है। इसलिए उन्होंने अपने नाग पुत्रों को आदेश दिया कि वे रात में जाकर उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपट जाएं। इससे अगली सुबह उसकी पूंछ काली दिखाई देगी। कुछ नागों ने छल में साथ देने से इनकार किया, लेकिन अन्य नाग पूंछ पर जाकर काले बालों की तरह लिपट गए।

अगले दिन दोनों बहनें घोड़े को देखने पहुंचीं। नागों के लिपटे होने के कारण उसकी पूंछ काली नजर आई। विनता शर्त हार गईं और उन्हें कद्रू तथा नागों की दासी बनना पड़ा।जब गरुड़ को पता चला कि उनकी माता छल के कारण दासी बनी हैं, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने नागों से पूछा कि उनकी माता को मुक्त करने के बदले उन्हें क्या चाहिए। नागों ने ऐसी वस्तु मांग ली, जिसे प्राप्त करना लगभग असंभव था, देवताओं के पास सुरक्षित अमृत कलश।

गरुड़ ले आए अमृत कलश:

गरुड़ ने अपनी माता को स्वतंत्र कराने के लिए स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी। अनेक बाधाओं और देवताओं का सामना करते हुए वे अमृत कलश ले आए। गरुड़ स्वयं अमर होना चाहते तो अमृत पी सकते थे, लेकिन उन्होंने उसकी एक बूंद भी नहीं पी। उनका एकमात्र उद्देश्य अपनी माता को दासता से मुक्त कराना था। गरुड़ ने अमृत कलश कुशा घास पर रखते हुए नागों से कहा कि वे पहले स्नान करके आएं।इसी बीच देवराज इंद्र कलश वापस ले गए। लौटकर नागों ने अमृत पाने की आशा में उस कुशा घास को चाटना शुरू कर दिया, जहां कलश रखा गया था। मान्यता है कि कुशा की धार से उनकी जीभ कट गई और तभी से नागों की जीभ दो भागों में बंटी हुई दिखाई देती है।

माता के साथ हुआ छल, वर्षों की दासता और अमृत के लिए रखी गई कठिन शर्त गरुड़ कभी नहीं भूले। पौराणिक कथा के अनुसार यही घटना गरुड़ और नागों के स्थायी बैर का कारण बनी।

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