एंटरटेनमेंट डेस्क। एक वक्त था जब बच्चे घंटों अपने खिलौनों के साथ खेलते थे, कभी गुड्डे-गुड़ियों की शादी कराते थे तो कभी उनके लिए अपनी अलग दुनिया बना लेते थे लेकिन अब मोबाइल और टैबलेट ने बच्चों की जिंदगी में इतनी जगह बना ली है कि खिलौने धीरे-धीरे पीछे छूटते जा रहे हैं। बच्चों के लिए बाहर निकलकर खेलना, दोस्त बनाना और असली दुनिया से जुड़ना कितना जरूरी है। यही बात ये फिल्म बेहद प्यारे अंदाज में बताती है।
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ये कहानी है बौनी यानि स्कारलेट स्पीयर्स की है। उसे अपने खिलौनों के साथ खेलना बहुत पसंद है, लेकिन उसके दोस्त नहीं बनते, उसकी इस परेशानी को देखकर उसके पैरेंट्स उसे लिलीपैड नाम का एक टैबलेट दिला देते हैं,धीरे-धीरे बौनी की दुनिया lilipad ही हो जाता है और वो अपने खिलौनों से दूर होती जाती है।
ये कहानी आज के समय में बहुत जरूरी लगती है। आज कई बच्चे मोबाइल और टैबलेट में इतने बिजी हो गए हैं कि बाहर खेलना और दोस्तों के साथ टाइम बिताना कम होता जा रहा है। फिल्म इसी बात को बहुत आसान और मजेदार तरीके से समझाती है। फिल्म के कई सीन दिल को छू जाते हैं। घर के किसी कोने में पड़े खिलौनों का ये सोचना कि बच्चे अब उनके साथ नहीं खेलते। काफी इमोशनल लगता है। वहीं रात में चादर के अंदर मोबाइल चलाते बच्चे या एक साथ बैठे होने के बावजूद अपने-अपने फोन में खोए बच्चे। आज की रियलिटी को अच्छी तरह दिखाते हैं।

सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म (film) तकनीक को गलत नहीं बताती। फिल्म ये नहीं कहती कि मोबाइल या टैबलेट खराब हैं, बल्कि ये दिखाती है कि तकनीक बच्चों के लिए फायदेमंद भी हो सकती है। बस उसका सही इस्तेमाल होना चाहिए। फिल्म में कई ऐसे सीन हैं जो बचपन की यादें ताजा कर देते हैं, गुड्डे-गुड़ियों की शादी, खिलौनों के साथ नई-नई कहानियां बनाना और अपनी कल्पना से उन्हें जिंदा कर देना। ये सब देखकर पुराने दिन याद आ जाते हैं खिलौनों की नजर से दिखाई गई दुनिया भी काफी मजेदार लगती है। यह फिल्म बहुत खूबसूरती से बताती है कि असली खेल और मोबाइल गेम में क्या फर्क होता है, फिल्म का एनीमेशन बहुत अच्छा है।
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