डेस्क। सरकारी सेवा में बिना पूर्व अनुमति के अनुपस्थित रहना अनुशासनहीनता मानी जाती है। केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियमों जैसे नियम यह साफ करते हैं कि उपस्थिति और अनुशासन एक जरूरी कर्तव्य है। सजा इस बात पर निर्भर करती है कि कर्मचारी (Government Employee) कितने समय तक अनुपस्थित रहता है और क्या उसके पास कोई वैध वजह है।
यह भी पढ़ें-देश के नाम कब-कब अचानक संबोधन दे चुके हैं PM मोदी? किए थे बड़े ऐलान
पहला कदम आमतौर पर कर्मचारियों को एक औपचारिक नोटिस या फिर ज्ञापन जारी करना होता है। अधिकारी अनुपस्थित के संबंध में वजह और स्पष्टीकरण मांगते हैं। अगर जवाब से संतोष नहीं मिलता या फिर कोई स्पष्टीकरण नहीं देता तो मामला अनुशासनात्मक कार्यवाही में बदल जाता है। सबसे तत्काल दंडों में से एक है आर्थिक दंड।

अनुपस्थिति की अवधि को डाईज नॉन के रूप में बताया जा सकता है। इसका मतलब होता है कि उन दिनों के लिए कोई वेतन नहीं दिया जाता। इसके अलावा यह अवधि प्रमोशन, वेतन वृद्धि या फिर पेंशन लाभों के लिए नहीं गिनी जाती। ज्यादा गंभीर मामलों में कर्मचारियों को निलंबित किया जा सकता है। इसी के साथ निलंबन के दौरान उन्हें पूरा वेतन नहीं मिलता। जांच पूरी होने तक लगभग 50% वेतन ही निर्वाह भत्ते के रूप में दिया जाता है।
अगर अनुपस्थित जारी रहती है या फिर जानबूझकर किया गया काम लगता है तो एक औपचारिक आरोप पत्र भी जारी किया जाता है। एक विभागीय जांच की जाती है जिसमें सबूतों की जांच होती है। कोई भी आखिरी फैसला लेने से पहले कर्मचारियों को अपना बचाव करने का मौका दिया जाता है। अगर कोई कर्मचारी बिना अनुमति के 1 साल से ज्यादा समय तक अनुपस्थित रहता है तो उसके मूल नियमों के तहत इस्तीफा दिया हुआ माना जा सकता है।
Tag: #nextindiatimes #GovernmentEmployee #GovernmentRules




