डेस्क। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को केंद्रीय Budget 2026 पेश करने वाली हैं। यह उनका लगातार नौंवा बजट होगा। यह ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता का सामना कर रही है। इसी बीच आइए जानते हैं कि आखिर सरकार यह कैसे तय करती है कि किस योजना में कितना पैसा जाएगा?
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बजट आवंटन सिर्फ इस वजह से नहीं दिए जाते क्योंकि कोई मंत्रालय ज्यादा पैसे मांगता है। वित्त मंत्रालय चार प्रमुख तकनीकी मानदंडों का इस्तेमाल करके प्रस्तावों का मूल्यांकन करता है। सरकार पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देती है। ऐसे इसलिए क्योंकि यह केवल वेतन या रखरखाव के लिए धन देने के बजाय लंबे समय की संपत्ति बनता है और विकास को बढ़ावा देता है। दूसरा है आने वाले वित्तीय वर्ष के लिए नॉमिनल जीडीपी अनुमान। सभी बजट संख्याएं जीडीपी के प्रतिशत के रूप में गणना की जाती है। इसमें वास्तविक विकास और इन्फ्लेशन दोनों शामिल है।

एक बार जब कुल अपेक्षित राजस्व की गणना हो जाती है तो सरकार इसे 100 पैसे की तरह मानती है जिसे वितरित किया जाना चाहिए। एक बड़ा हिस्सा अनिवार्य एक्सपेंडिचर के रूप में लॉक कर दिया जाता है। अकेले ब्याज भुगतान कुल खर्च का लगभग 20% इस्तेमाल करता है। सेंट्रल टैक्स में राज्यों का हिस्सा लगभग 22% है और डिफेंस एक्सपेंडिचर लगभग 8%. सैलरी और पेंशन भी ज्यादातर नॉन नेगोशिएबल होते हैं।
इन तय खर्चों का हिसाब लगाने के बाद ही सरकार तय करती है कि डेवलपमेंट स्कीम के लिए कितना पैसा बचा है। बचे हुए फंड को सेंट्रल सेक्टर स्कीम और केंद्रीय प्रायोजित स्कीम में बांटा जाता है। यहां खर्च अक्सर 60:40 या 50:50 के अनुपात में राज्यों के साथ शेयर किया जाता है।
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