डेस्क। भारत में कई पहाड़ी राज्य, राज्य के बाहर के लोगों को जमीन की खरीद की मंजूरी नहीं देते। ये नियम स्थानीय निवासियों के लिए अधिकारों की रक्षा, पारंपरिक संस्कृतियों को संरक्षित करने, सीमित कृषि भूमि के संरक्षण और नाजुक पर्वत पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के लिए पेश किए गए थे। इस तरह के सबसे शुरुआती और सबसे बड़े कानूनों में से एक 1972 में हिमाचल प्रदेश किरायेदारी और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 118 के जरिये से अधिनियमित किया गया था।
यह भी पढ़ें-जासूसी के आरोप में पकड़े जाने पर भारत में कितनी मिलती है सजा?
इन कानून को इस वजह से लागू किया गया था क्योंकि पहाड़ी समुदायों की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करना था। पहाड़ी राज्यों (mountains) में कुछ खास परंपराएं, जीवन शैली और जनसांख्यिकीय विशेषताएं हैं। बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीद समय के साथ स्थानीय जनसंख्या संतुलन को बदल सकती है।
दूसरी सबसे बड़ी वजह कृषि भूमि की सुरक्षा है। पहाड़ी इलाकों में उपजाऊ भूमि काफी सीमित है। यह चिंता भी रही है कि मैदानी इलाकों के धनी खरीदार होटल, रिसॉर्ट या फिर फार्म हाउस के लिए बड़े क्षेत्र खरीद सकते हैं। इससे स्थानीय किसानों के लिए भूमि की उपलब्धता कम हो जाएगी। पर्यावरण संरक्षण भी एक बड़ी वजह है। हिमालय क्षेत्र काफी ज्यादा नाजुक है। बड़े पैमाने पर निर्माण और व्यावसायिक विकास से भूस्खलन और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।

बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीद पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला बड़ा कानून 1972 में हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डॉ यशवंत सिंह परमार के नेतृत्व में पेश किया गया था। हिमाचल प्रदेश किरायेदारी और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 118 गैर हिमाचली, साथ ही ऐसे हिमाचल निवासी जो कृषक नहीं हैं को राज्य में कृषि भूमि खरीदने से रोकती है। हालांकि खास सरकारी अनुमति के साथ बाहरी लोग घर बनाने जैसे उद्देश्यों के लिए गैर कृषि या फिर शहरी भूमि का एक सीमित क्षेत्र, लगभग 500 वर्ग मीटर तक खरीद सकते हैं।
Tag: #nextindiatimes #mountains #Law




