डेस्क। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान (iran) पर किए गए संयुक्त हवाई हमलों के बाद से पूरा मिडिल-ईस्ट (मध्य पूर्व) तनाव की चपेट में है। एक तरफ ईरान ने वैश्विक ईंधन आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को बंद कर रखा है, तो दूसरी तरफ लाल सागर (Red Sea) को हिंद महासागर से जोड़ने वाले बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य (Bab al-Mandab Strait) पर हूती विद्रोहियों ने अपना दबदबा मजबूत कर लिया है।
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परिणामस्वरूप, जो युद्ध ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच शुरू हुआ था, उसका केंद्र अब हजारों किलोमीटर दूर यमन और सऊदी अरब की सीमाओं तक फैल गया है।
तनाव की मुख्य वजह: सना एयरपोर्ट की घटना
यमन के हूती विद्रोही और सऊदी अरब लंबे समय से एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। लेकिन हाल ही में यमन की राजधानी सना (Sanaa) के एयरपोर्ट पर हुई एक घटना ने इस विवाद में आग में घी डालने का काम किया।
- ईरानी विमान पर हमला:
- यमन की ‘सऊदी अरब समर्थित सरकार’ ने सना एयरपोर्ट के रनवे पर बमबारी करके ईरान से आ रहे एक विमान की लैंडिंग रोक दी। यमनी सरकार का आरोप था कि यह विमान उनकी देश की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा था और इसके जरिए हूती विद्रोहियों तक हथियार पहुँचाए जा रहे थे।
- हूतियों की ‘आंख के बदले आंख’ की धमकी:
- इस घटना के बाद हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने ऐलान किया कि इस हमले ने यमन में चल रहे तनाव घटाने (De-escalation) के दौर को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। हूतियों ने कसम खाई कि वे अब सऊदी अरब के हवाई व समुद्री रास्तों को ब्लॉक करेंगे और उनके जहाजों को निशाना बनाएंगे।
रणनीतिक ठिकानों पर हूतियों का कब्जा:
सना एयरपोर्ट विवाद के बाद हूती विद्रोहियों ने न केवल सऊदी अरब के शहरों और जहाजों पर हमले तेज किए,
बल्कि यमन में जमीनी सैन्य कार्रवाई भी बढ़ा दी।
- मोखा पोर्ट (Mokha Port):
- हूतियों ने यमनी सरकार से रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मोखा पोर्ट सिटी को छीन लिया है।
- मयून द्वीप (Mayun Island):
- बाब अल-मन्दब के पास स्थित मयून द्वीप सहित कई छोटे द्वीपों पर हूतियों ने कब्जा जमा लिया है।
- लाल सागर और स्वेज नहर (Suez Canal) के व्यापारिक समुद्री मार्गों पर उनका सीधा नियंत्रण स्थापित हो गया है।

सऊदी अरब और हूतियों के बीच ऐतिहासिक दुश्मनी:
सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच जारी इस जंग के पीछे धार्मिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय कारण शामिल हैं।
- शिया-सुन्नी और वैचारिक मतभेद:
- सऊदी अरब एक सुन्नी बहुल देश है, जबकि हूती विद्रोही शिया (जैदी) समुदाय से आते हैं।
- हूतियों की विचारधारा सऊदी सरकार की नीतियों के सख्त खिलाफ है।
- ईरान का ‘प्रॉक्सी वॉर’:
- हूती विद्रोहियों को ईरान से वित्तीय और सैन्य सहायता मिलती है।
- मिडिल-ईस्ट में क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई के कारण यमन पिछले एक दशक से सऊदी अरब और ईरान के बीच ‘प्रॉक्सी वॉर’ (Proxy War) का मैदान बना हुआ है।
- सऊदी की राष्ट्रीय सुरक्षा:
- 2014-15 में हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा करके वहां की सरकार को उखाड़ फेंका था।
- अपनी दक्षिणी सीमा पर एक शक्तिशाली ईरान-समर्थित शिया समूह (हूती) का मजबूत होना सऊदी अरब अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है।
कौन हैं हूती विद्रोही?
हूती आंदोलन की शुरुआत 1990 के दशक में शिया धर्मगुरु हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती ने की थी, जिनके नाम पर इस संगठन का नाम पड़ा। शुरुआती दौर में यह गुट यमनी सरकार में फैले भ्रष्टाचार और उसकी अमेरिका-इजरायल के साथ नजदीकियों का विरोध करता था। बाद में 2014-2015 में इस संगठन ने पूरे यमन में गृहयुद्ध (Civil War) छेड़ दिया और देश के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया।
वर्तमान में अमेरिका और ईरान की व्यापक जंग का सबसे बड़ा असर लाल सागर के जलमार्गों और सऊदी अरब-यमन सीमा पर देखने को मिल रहा है।
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