13 मामलों में मौत की सजा, फिर बरी; पढ़ें निठारी कांड के सुरेंद्र कोली के राज

नोएडा। देश को झकझोर कर रख देने वाले बहुचर्चित निठारी कांड (Nithari case) के मुख्य आरोपी रहे सुरेंद्र कोली (Surendra Koli) ने उत्तराखंड के हरिद्वार में संदिग्ध परिस्थितियों में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। सुप्रीम कोर्ट से सभी मामलों में बरी होने के बाद जेल से बाहर आया कोली हरिद्वार में चाय की दुकान (ठिया) चला रहा था। उसकी अचानक हुई मौत के साथ ही 19 मासूम बच्चों के कत्ल और निठारी के उन भयावह रहस्यों का सच हमेशा के लिए दफन हो गया है।

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13 मामलों में मौत की सजा और फिर सुप्रीम कोर्ट से बरी:

निठारी कांड में गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने सुरेंद्र कोली को कई मामलों में फांसी की सजा सुनाई थी।

हालांकि, उच्च न्यायपालिकाओं से उसे राहत मिलती चली गई।

फांसी की सजा उम्रकैद में बदली:

साल 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दया याचिका पर फैसले में अत्यधिक देरी के आधार पर कोली की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था।

12 मामलों में हाईकोर्ट से बरी:

अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में सुरेंद्र कोली और सह-आरोपी मोनिंदर सिंह पंधेर को 12 मामलों में बरी कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट से दोषमुक्त:

अंतिम बचे मामले में 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली को पूरी तरह से दोषमुक्त कर दिया, जिसके बाद वह जेल से रिहा हो गया था।

जांच एजेंसियों की लचर कार्यप्रणाली और ढीली पैरवी:

इतने बड़े नरसंहार के बावजूद दोनों आरोपियों का बरी होना पुलिस और सीबीआई की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

कोर्ट में मामले के कमजोर पड़ने के मुख्य कारण निम्नलिखित रहे:

ठोस और वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी:

पुलिस और सीबीआई की टीमें अदालत के सामने कोई भी मजबूत फोरेंसिक या वैज्ञानिक सबूत पेश करने में नाकाम रहीं।

प्रक्रियात्मक गलतियां:

नाले से कंकाल बरामद करते समय कानूनी प्रक्रियाओं का सही से पालन नहीं किया गया।

इसके अलावा, आरोपी की समय पर मेडिकल जांच तक नहीं कराई गई थी।

कोठी से खून और अवशेष न मिलना:

पंधेर की कोठी के अंदर कपड़ों पर खून के धब्बे या इंसानी मांस-हड्डियों के टुकड़े बरामद नहीं हुए, जिससे यह साबित नहीं हो सका कि हत्याएं कोठी के भीतर ही हुई थीं।

फर्जी क्लिप्स और हस्ताक्षर की अनुपस्थिति:

कबूलनामे से जुड़ी ऑडियो-वीडियो क्लिप्स की चिप नकली पाई गई और कबूलनामे के मुख्य दस्तावेजों पर सुरेंद्र कोली के हस्ताक्षर भी नहीं थे।

अंग तस्करी का एंगल साबित न होना:

सीबीआई जांच में यह दावा भी साबित नहीं हो सका कि आरोपी मानव अंगों की तस्करी में शामिल थे।

2006 का वह खौफनाक दौर जिसने देश को हिला दिया:

29 दिसंबर 2006 को नोएडा के निठारी गांव में मोनिंदर सिंह पंधेर की कोठी के पीछे बने नाले से 8 बच्चों के कंकाल बरामद हुए थे। जांच आगे बढ़ी तो वहां से कई बच्चों के अवशेष मिले। पंधेर का घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली इस पूरे मामले का मुख्य आरोपी बनाया गया था।

आरूषी हत्याकांड की तरह ही निठारी कांड भी अब एक अबूझ पहेली बनकर रह गया है।

कानूनी कमियों और कमजोर जांच के चलते 19 मासूम बच्चों और उनके पीड़ित परिवारों को कभी न्याय नहीं मिल सका।

अब कोली की मौत के साथ इस कांड की सच्चाई हमेशा के लिए एक रहस्य बन गई है।

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