कोलकाता। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को जब बंगाल में भाजपा के प्रमुख चेहरों में एक सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) के आधिकारिक तौर पर पार्टी के विधायक दल का नेता चुने जाने की घोषणा की तो राज्य में शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ होगा। वह राज्य में मुख्यमंत्री पद पर काबिज होने वाले भाजपा के पहले नेता भी होंगे।
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एक समय ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार रहे सुवेंदु ने टीएमसी छोड़कर बीजेपी जॉइन की और पार्टी को 3 सीटों से 77 पार कराते हुए दो तिहाई बहुमत की राह दिखाई। उनकी जमीनी रणनीति, नंदीग्राम की विरासत और ममता की चुनावी कमजोरियों को भेदने का हुनर बंगाल की राजनीति में सबसे ज्यादा काम आया।
सुवेंदु अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पूर्वी मेदिनीपुर के कांथी में एक समृद्ध राजनीतिक परिवार में हुआ। उनके पिता शिशिर अधिकारी बंगाल की राजनीति के दिग्गज नेता रहे हैं। अधिकारी परिवार का मेदिनीपुर क्षेत्र पर दशकों से मजबूत प्रभाव रहा है। शुभेंदु ने राजनीति की बुनियादी शिक्षा घर पर ही पाई। 1989 में उन्होंने कांग्रेस की छात्र परिषद से अपना सफर शुरू किया। उस समय बंगाल में वामपंथी छात्र संगठनों का दबदबा था। विपक्षी छात्र नेता के रूप में उन्होंने कड़ी चुनौतियों का सामना किया।

1995 में कांथी नगर पालिका के पार्षद बनकर उन्होंने औपचारिक चुनावी राजनीति में कदम रखा। 1998 में ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस गठन के साथ ही अधिकारी परिवार टीएमसी से जुड़ गया। सुवेंदु अधिकारी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 2007 का नंदीग्राम आंदोलन रहा। वामपंथी सरकार द्वारा किसानों की जमीन अधिग्रहण के फैसले के खिलाफ उन्होंने ‘भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी’ (BUPC) का गठन किया। ममता बनर्जी मीडिया और दिल्ली में आवाज उठा रही थीं, लेकिन नंदीग्राम की पगडंडियों पर असली लड़ाई शुभेंदु लड़ रहे थे।
वे रातों को गांवों में रुकते, स्थानीय भाषा में लोगों से बात करते और पुलिस-काडर के दबाव के खिलाफ किसानों की ढाल बने। 14 मार्च 2007 की पुलिस फायरिंग के बाद भी उन्होंने घायलों की मदद की और आंदोलन को मजबूत रखा। जानकार मानते हैं कि नंदीग्राम आंदोलन की सफलता में सुवेंदु की जमीनी भूमिका अहम थी, जिसने 2011 में 34 साल पुरानी वाम सरकार के पतन का रास्ता तैयार किया।
लंबे समय तक ममता बनर्जी के वफादार रहे सुवेंदु 2020-21 में पार्टी से दूर होते गए। 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता ने अपनी सुरक्षित भवानीपुर सीट छोड़कर नंदीग्राम से सुवेंदु के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन शुभेंदु ने उन्हें हरा दिया।
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