EVM या फिर बैलेट पेपर; देखें किसमें ज्यादा आता है चुनाव खर्च?

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने देश के सियासी गलियारों में एक बार फिर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की बहस को जोरदार तरीके से गर्मा दिया है। वाराणसी और आगरा जैसी महत्वपूर्ण विधान परिषद सीटों पर समाजवादी पार्टी (सपा) की बड़ी जीत ने पारंपरिक चुनावी व्यवस्था पर विपक्ष के भरोसे को नया बल दिया है।

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अखिलेश यादव की अगुवाई में सपा लंबे समय से ईवीएम (EVM) के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की पुरजोर वकालत करती रही है और इन हालिया चुनावी नतीजों को पार्टी अपने उसी पुराने नैरेटिव की सबसे बड़ी कामयाबी के रूप में पेश कर रही है।

हालांकि

इस राजनीतिक खींचतान और जीत-हार के दावों से बिल्कुल अलग,

जब देश के चुनावी खर्च और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ की बात आती है,

तो भारतीय चुनाव आयोग के आंकड़े एक बेहद अलग और चौंकाने वाली हकीकत सामने रखते हैं।

कागजी मतपत्रों का भारी-भरकम वित्तीय बोझ:

आम तौर पर यह माना जाता है कि हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की खरीद और रखरखाव में भारी-भरकम बजट की जरूरत होती है, जिससे यह प्रक्रिया महंगी लगती है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, लंबे समय में बैलेट पेपर से चुनाव कराना देश के सरकारी खजाने के लिए कहीं ज्यादा नुकसानदेह और खर्चीला साबित होता है।

  • कागज की भारी खपत:
  • देश के करोड़ों मतदाताओं के लिए भारी मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाले कागजों की छपाई करानी पड़ती है,
  • जिससे खजाने पर भारी असर पड़ता है।
  • लॉजिस्टिक्स और परिवहन:
  • लोहे और भारी मैटीरियल से बनी मतपेटियों को देश के सुदूर पोलिंग बूथों तक सुरक्षित पहुंचाने और वापस लाने के लिए एक बहुत बड़े परिवहन बेड़े की जरूरत होती है,
  • जिसका कुल खर्च ईवीएम के मुकाबले कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है।

प्रशासनिक मैनपावर और सुरक्षा की लागत:

पारंपरिक मतपत्रों के इस्तेमाल में सिर्फ सामग्री ही महंगी नहीं पड़ती,

बल्कि मतदान के बाद होने वाली पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया भी सरकार के बजट को अत्यधिक बढ़ा देती है।

  • बैलेट पेपर की सुरक्षा और उनकी मैन्युअल (हाथ से) गिनती के लिए हजारों मतदान अधिकारियों,
  • अतिरिक्त सुरक्षाकर्मियों और प्रशासनिक अमले को कई-कई दिनों तक काउंटिंग सेंटर्स पर तैनात रखना पड़ता है।
  • इससे इन कर्मचारियों का दैनिक भत्ता, भोजन और अतिरिक्त सुरक्षा प्रबंधों का खर्च आसमान छूने लगता है।

इसके विपरीत, आधुनिक ईवीएम मशीनें बेहद हल्की और सुरक्षित बॉक्स में आसानी से ट्रांसपोर्ट करने योग्य होती हैं। इनकी शुरुआती खरीद की लागत भी इनके लंबे जीवनकाल की वजह से आसानी से वसूल हो जाती है, क्योंकि एक ही ईवीएम का इस्तेमाल लगातार पंद्रह सालों तक कई बड़े आम चुनावों और विधानसभा चुनावों में बार-बार सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

पर्यावरण की सुरक्षा और वक्त की बड़ी बचत:

वित्तीय खर्चों के अलावा बैलेट पेपर से होने वाले चुनावों का एक बहुत बड़ा खामियाजा देश को पर्यावरण और समय के भारी नुकसान के रूप में भी भुगतना पड़ता है:

  • पेड़ों की कटाई:
  • एक पूरे आम चुनाव को कागजी मतपत्रों से संपन्न कराने के लिए लगभग दस हजार टन कागज की खपत होती है, जिसके लिए लाखों हरे-भरे पेड़ों को काटना पड़ता है, जबकि डिजिटल वोटिंग ने इस पर्यावरणीय बर्बादी को पूरी तरह रोक दिया है।
  • समय की बचत:
  • मतपत्रों की मैन्युअल गिनती में कई दिनों का लंबा समय बर्बाद होता है और पूरा सरकारी तंत्र उसी काम में उलझा रहता है, जबकि मशीनों के इस्तेमाल से देश के चुनावी नतीजे महज कुछ ही घंटों के भीतर पूरी पारदर्शिता के साथ सामने आ जाते हैं।
  • चुनाव आयोग राजस्व और समय दोनों की बचत के लिहाज से ईवीएम को सबसे सटीक माध्यम मानता है।

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