बंगाल की खाड़ी में क्यों आते हैं भयानक तूफान, क्यों कहलाता है ‘चक्रवातों का गढ़’

डेस्क। पूर्वी भारत के तटीय इलाकों पर एक बार फिर एक खतरनाक चक्रवाती तूफान (cyclone) का खतरा मंडराने लगा है। बंगाल की खाड़ी में बने मौसमी सिस्टम ने अब एक ताकतवर साइक्लोन ‘अर्नब’ (Arnab) का रूप ले लिया है। मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, यह चक्रवात तेजी से आगे बढ़ते हुए आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों से टकरा सकता है।

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इस गंभीर स्थिति को देखते हुए तमाम तटीय इलाकों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है और प्रशासन सुरक्षा व बचाव कार्यों की तैयारियों में पूरी तरह जुट गया है। हालांकि, इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बंगाल की खाड़ी में ऐसी कौन-सी भौगोलिक विशेषताएं हैं, जो इसे बार-बार विनाशकारी तूफानों का गढ़ बना देती हैं।

अरब सागर के मुकाबले बंगाल की खाड़ी में ज्यादा तूफान क्यों?

उत्तर हिंद महासागर के समुद्री क्षेत्र में यदि तूफानों के इतिहास को देखा जाए, तो बंगाल की खाड़ी हमेशा से सबसे ज्यादा संवेदनशील रही है। मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, अरब सागर की तुलना में बंगाल की खाड़ी में उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones) बनने की दर औसतन करीब चार गुना अधिक पाई जाती है। हालांकि जलवायु परिवर्तन के कारण अब अरब सागर में भी तूफानों की तीव्रता बढ़ी है,

फिर भी बंगाल की खाड़ी की अनूठी बनावट और मौसमी परिस्थितियां इसे तूफानों के लिए सबसे अनुकूल बनाती हैं।

तूफानों को ऊर्जा देने वाले मुख्य कारण:

  • गर्म समुद्री जल:
  • किसी भी चक्रवात को मुख्य ऊर्जा समुद्र के गर्म पानी से मिलती है। जब बंगाल की खाड़ी के पानी का तापमान 26.5°C से 28°C या उससे अधिक हो जाता है, तो वाष्पीकरण तेज हो जाता है। इससे ऊपर उठने वाली जलवाष्प बादलों का निर्माण करती है और गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) बाहर निकलकर समुद्र की सतह पर कम हवा का दबाव (Low-Pressure Area) पैदा करती है,
  • जो चक्रवात का मुख्य इंजन बनती है।
  • नदियों का मीठा पानी:
  • गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी और गोदावरी जैसी विशाल नदियां भारी मात्रा में मीठा पानी इस खाड़ी में गिराती हैं। मीठा पानी हल्का होने के कारण ऊपरी परत पर जमा रहता है और नीचे के ठंडे पानी को ऊपर नहीं आने देता।
  • इससे समुद्र की ऊपरी परत लगातार गर्म बनी रहती है और तूफान को असीमित ऊर्जा मिलती है।
  • कमजोर वर्टिकल विंड शीयर:
  • अलग-अलग ऊंचाइयों पर चलने वाली हवाओं की गति और दिशा के अंतर को विंड शीयर कहते हैं।
  • बंगाल की खाड़ी में यह विंड शीयर अक्सर कमजोर होता है,
  • जिससे बादलों और हवाओं का चक्राकार ढांचा बिना किसी रुकावट के बेहद शक्तिशाली रूप ले लेता है।

अक्टूबर और नवंबर में ही क्यों बढ़ता है खतरा?

उत्तरी हिंद महासागर में चक्रवातों के आने के मुख्य रूप से दो सीजन होते हैं—पहला अप्रैल से जून (प्री-मानसून) और दूसरा अक्टूबर से दिसंबर (पोस्ट-मानसून)। अक्टूबर और नवंबर के महीनों में मानसून की पूरी वापसी हो चुकी होती है और हवाएं शांत पड़ने लगती हैं। इस दौरान वायुमंडल की अत्यधिक नमी, समुद्र का गर्म तापमान और अनुकूल हवाएं मिलकर चक्रवातों को तेजी से विकसित होने में सबसे ज्यादा मदद करती हैं।

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