डेस्क। हर साल 26 जुलाई को पूरा देश ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में मनाता है। यह वही ऐतिहासिक दिन है जब 1999 में भारतीय सेना के जांबाजों ने लद्दाख की बर्फीली और बेहद दुर्गम चोटियों पर तिरंगा फहराकर पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ दिया था।
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मई 1999 में शुरू हुए इस युद्ध में पाकिस्तान की सेना और आतंकी ऊंचे पहाड़ों पर बने बंकरों में मजबूत स्थिति में बैठे थे, जबकि भारतीय सैनिक नीचे से ऊपर चढ़कर लड़ाई लड़ रहे थे। इस बेहद मुश्किल भू-भाग में भारत की जीत का रास्ता हमारे सैनिकों के अदम्य साहस और सेना के अचूक हथियारों ने बनाया था।
बोफोर्स FH-77B होवित्जर तोप:
कारगिल युद्ध (Kargil) में स्वीडन से खरीदी गई 155 एमएम वाली बोफोर्स FH-77B होवित्जर तोप ने अपनी ताकत का लोहा मनवाया। 42 किलोमीटर तक सटीक निशाना लगाने वाली इस तोप ने ‘डायरेक्ट फायर’ तकनीक का इस्तेमाल कर ऊंची चोटियों पर बैठे दुश्मनों के बंकरों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

युद्ध के दौरान स्थिति यह हो गई थी कि टाइगर हिल और तोलोलिंग को मुक्त कराने के लिए हर दिन औसतन 5,000 से ज्यादा गोले, मोर्टार और रॉकेट दागे (Kargil Vijay Diwas Weapons) जा रहे थे। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब लगातार और भीषण गोलाबारी के कारण महज 25 दिनों में ही 18 बोफोर्स तोपों की बैरल घिस गई थीं। इस तोप के खौफ ने पाकिस्तानी सैनिकों के हौसले पूरी तरह तोड़ दिए थे।
बीएम-21 ग्रैड रॉकेट लॉन्चर और 105mm फील्ड गन:
बोफोर्स के साथ-साथ बीएम-21 ग्रैड (BM-21 Grad) मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर ने भी दुश्मनों के बीच भारी तबाही मचाई थी। यह एक बार में दर्जनों रॉकेट दुश्मन के इलाके में दागकर पूरे पहाड़ को थर्रा देता था। इसके अलावा भारत की स्वदेशी 105mm इंडियन फील्ड गन और 120mm हैवी मोर्टार ने पैदल सेना को वह सुरक्षा कवर दिया, जिसकी बदौलत हमारे सैनिक सीधी चढ़ाई चढ़ने में आसानी से सफल हुए।
इंसास राइफल और 84mm कार्ल गुस्ताव:
आमने-सामने की लड़ाई में भारतीय सैनिकों के हाथों में उस समय नई-नई शामिल हुई इंसास (INSAS) 5.56mm राइफल और एसएलआर थीं। पहाड़ियों पर बने मजबूत कंक्रीट बंकरों को उड़ाने के लिए सैनिकों ने स्वीडिश 84mm कार्ल गुस्ताव रिकॉइललेस राइफल और हाथ के गोलों (Hand Grenades) का व्यापक उपयोग किया। इसी की बदौलत प्वाइंट 4875 और तोलोलिंग जैसी चोटियों पर कब्जा संभव हो पाया।
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