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शुक्रवार, जून 5, 2026

जब डाक टिकटों और पोस्टकार्ड से हुई थी जनगणना, जानें क्या था वो किस्सा

नई दिल्ली। भारत आज अपनी नई जनगणना की तैयारी कर रहा है। यह आजादी के बाद देश की आठवीं और कुल 16वीं जनगणना होगी। इस बार जनगणना कर्मचारी मोबाइल ऐप की मदद से लोगों की जानकारी दर्ज करेंगे और डेटा सीधे डिजिटल सिस्टम में अपलोड किया जाएगा लेकिन कई दशक पहले हालात बिल्कुल अलग थे। फिलहाल आइए जानते हैं कि देश की जनगणना कब डाक टिकटों और पोस्टकार्ड से हुई थी।

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भारत को आजादी मिलने के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देश की असली आबादी और सामाजिक स्थिति की जानकारी जुटाना थी। सरकार को चुनाव कराने, विकास योजनाएं बनाने और संसाधनों का सही वितरण करने के लिए भरोसेमंद आंकड़ों की जरूरत थी। इसी कारण स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 में कराई गई। जनगणना को इतना जरूरी माना गया कि संविधान लागू होने से पहले ही वर्ष 1948 में जनगणना अधिनियम पारित कर दिया गया था।

1950 और 1960 के दशक में न तो इंटरनेट था और न ही टीवी का इतना चलन था, उस समय डाक विभाग ही देश का सबसे बड़ा नेटवर्क था। देश के लाखों गांवों तक डाकिए नियमित रूप से चिट्ठियां पहुंचाते थे। कई गांवों में डाकिया सिर्फ पत्र पहुंचाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सरकारी सूचनाओं और संदेशों का माध्यम भी होता था। यही वजह थी कि सरकार ने जनगणना के प्रचार के लिए डाक टिकटों और पोस्टमार्क का यूज शुरू किया।

1951 की पहली स्वतंत्र भारत की जनगणना के दौरान डाक टिकटों, पोस्टमार्क और चिट्ठियों का यूज लोगों तक जनगणना का संदेश पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर किया गया था। जनवरी 1951 में जनगणना को बढ़ावा देने के लिए विशेष डाक-छाप यानी पोस्टमार्क जारी किए गए। इनमें एक छोटे परिवार की तस्वीर बनी होती थी और उसके साथ हिंदी और अंग्रेजी में भारत की जनगणना, फरवरी 1951 लिखा जाता था। ये पोस्टमार्क देश भर में भेजी जाने वाली चिट्ठियों और लिफाफों पर लगाए जाते थे जिससे लोगों तक जनगणना (Census) का संदेश आसानी से पहुंच सके।

ब्रिटिश शासन के दौरान हुई कुछ जनगणनाओं का कई इलाकों में विरोध हुआ था। ऐसे में स्वतंत्र भारत की सरकार चाहती थी कि लोग बिना किसी डर के अपनी जानकारी शेयर करें। इसी कारण डाक सामग्री में ऐसे संदेश शामिल किए गए जो लोगों को जनगणना के लिए प्रेरित करते थे।

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