नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में लोकसभा सांसदों पर हो रहे हिंसक हमलों ने देश की राजनीति और नेताओं की सुरक्षा (Security) पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस गंभीर माहौल के बीच आम जनता के मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि देश के सबसे बड़े सदन यानी लोकसभा के माननीय सांसदों को कानूनन कौन सी सुरक्षा मिलती है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि सुरक्षा का यह पूरा सरकारी ढांचा किस तरह काम करता है?
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आम तौर पर लोगों को लगता है कि लोकसभा का चुनाव जीतते ही हर सांसद को ऑटोमैटिक कोई बड़ी वीआईपी सुरक्षा मिल जाती है लेकिन हकीकत इसके उलट है। नियम के मुताबिक, लोकसभा सांसदों को केवल उनके पद या क्षेत्र के आधार पर कोई विशेष व्यक्तिगत सुरक्षा, जैसे X, Y, Z, या Z+ श्रेणी का घेरा नहीं दिया जाता है। देश के कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो सांसद बनते ही गनर दे दे। उन्हें सुरक्षा केवल उनकी जान को होने वाले निजी खतरे के आधार पर ही मिलती है।

भले ही सांसदों को बाहर व्यक्तिगत तौर पर तुरंत सुरक्षा न मिले लेकिन देश की संसद के भीतर उनकी सुरक्षा का बेहद पुख्ता इंतजाम होता है। जब भी कोई सांसद दिल्ली में संसद भवन के परिसर के अंदर होता है, तो उनकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और पार्लियामेंट सिक्योरिटी सर्विस (PSS) की होती है। संसद भवन की सीमा के अंदर बिना इजाजत या गहन चेकिंग के किसी भी बाहरी तत्व का प्रवेश करना पूरी तरह नामुमकिन होता है।
जब कोई लोकसभा सांसद दिल्ली से बाहर अपने गृह राज्य या खुद के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में दौरा करता है, तो उनकी सुरक्षा का जिम्मा राज्य सरकार के कंधों पर आ जाता है। स्थानीय इंटेलिजेंस की इनपुट और सांसद के प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए संबंधित राज्य का पुलिस बल उनके लिए गनर या एस्कॉर्ट गाड़ी की व्यवस्था करता है। चांदीतला में कल्याण बनर्जी के मामले में भी स्थानीय पुलिस तैनात थी, लेकिन अचानक भड़की भीड़ के कारण स्थिति बेकाबू हो गई।
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