नई दिल्ली। करीब चार सौ साल पहले एक व्यापारिक कंपनी के रूप में शुरू हुआ नाम, जिसने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी थी। कभी भारत में अपना साम्राज्य चलाने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) का आधुनिक रूप 2025 में दिवालिया होकर बंद हो गया था।
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1874 में मूल कंपनी के खत्म होने के बाद 2005 में इसे एक लग्जरी ब्रांड के तौर पर फिर जिंदा किया गया था लेकिन आर्थिक संकट के कारण आधुनिक कंपनी भी टिक नहीं पाई और अब दोबारा इतिहास बन गई है। शुरुआत में यह एक ट्रेडिंग कंपनी थी, जो यूरोप और एशिया के बीच व्यापार करती थी। इसके मुख्य कारोबार में शामिल थे- भारत से कपास, रेशम, नील (इंडिगो), मसाले और साल्टपीटर।
2005 के आसपास भारत में जन्मे ब्रिटिश कारोबारी संजीव मेहता ने इस ऐतिहासिक नाम के राइट्स खरीद लिए। उन्होंने 2003 से 2005 के बीच कंपनी का ब्रांड, नाम और प्रतीक चिह्न हासिल किया। इसके बाद कंपनी को एक लक्जरी रिटेल ब्रांड के रूप में दोबारा शुरू किया गया। इसका मुख्य स्टोर लंदन के मेफेयर इलाके में खोला गया था।

नई ईस्ट इंडिया कंपनी कोई साम्राज्य नहीं चला रही थी। यह एक हाई-एंड रिटेल ब्रांड थी जो प्रीमियम प्रोडक्ट बेचती थी। मुख्य उत्पाद थे- महंगी चाय, कॉफी, चॉकलेट, मसाले, गिफ्ट हैम्पर। ब्रांड को एक लग्जरी और ऐतिहासिक पहचान के साथ पेश किया गया। इसे कई लोग इतिहास का उल्टा मोड़ भी कहते थे क्योंकि जिस कंपनी ने कभी भारत पर शासन किया था, उसका नाम अब एक भारतीय मूल के कारोबारी के पास था। आखिरकार 2025 में कंपनी आधिकारिक रूप से लिक्विडेशन में चली गई, यानी उसकी संपत्तियां बेची जाएंगी और कर्ज चुकाया जाएगा।
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