डेस्क। हिंदू धर्म में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले मुहूर्त और भद्रा का विचार अवश्य किया जाता है, होलिका दहन के समय भद्रा (Bhadra) का होना बहुत ही संवेदनशील माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भद्रा काल को विघ्नकारी माना गया है, जिसमें किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्यों के सफल न होने की आशंका बनी रहती है।
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पौराणिक कथाओं के अनुसार, भद्रा सूर्य देव की पुत्री और न्याय के देवता शनि देव की सगी बहन है। जब भद्रा का जन्म हुआ, तो वह स्वभाव से बहुत ही उग्र और विनाशकारी थी। वह जन्म लेते ही पूरे संसार को निगलने और यज्ञ-अनुष्ठानों में बाधा डालने लगी। उनके स्वभाव के कारण ऋषि-मुनि और देवता भी भयभीत रहने लगे।
भद्रा के इस विनाशकारी व्यवहार को देखते हुए ब्रह्मा जी ने उसे समझाया और उन्हें पंचांग के एक विशेष समय (विष्टि करण) में स्थान दिया। ब्रह्मा जी ने कहा कि जो व्यक्ति भद्रा के समय में कोई भी मांगलिक या शुभ कार्य करेगा, उसे सफलता नहीं मिलेगी। तभी से शुभ कार्यों में भद्रा का त्याग किया जाने लगा।

मान्यता है कि यदि भद्रा में होलिका दहन किया जाए, तो उस स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है और जन-धन की हानि भी हो सकती है। भद्रा के समय अग्नि जलाना अशुभ फल देने वाला माना जाता है। इसलिए, भक्त हमेशा भद्रा के पुंछा भाग या भद्रा की समाप्ति का इंतजार करते हैं ताकि सभी मांगलिक कार्य सुचारु रूप से हो सकें। ज्योतिषीय दृष्टि से भद्रा काल में मानसिक एकाग्रता में कमी आने की आशंका होती है। इस समय ग्रहों की स्थिति कुछ ऐसी होती है जो व्यक्ति के भीतर क्रोध और भ्रम पैदा कर सकती है।
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