नई दिल्ली। एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट मनी लॉन्ड्रिंग और गैरकानूनी विदेशी ट्रांजैक्शन जैसे फाइनेंशियल क्राइम की जांच में एक बड़ी भूमिका निभाता है। रेड के दौरान ED के अधिकारी अक्सर काफी ज्यादा कैश, प्रॉपर्टी और दूसरे असेट्स जब्त करते हैं। लेकिन जब्त किए गए पैसे को कैसे हैंडल और स्टोर किया जाता है इसके लिए एक सख्त कानूनी और बैंकिंग प्रक्रिया है।
यह भी पढ़ें-जनगणना कराने में कितना आता है खर्च?
जब ईडी के अधिकारी रेड के दौरान कैश को जब्त करते हैं तो पैसा तुरंत ही सरकारी कस्टडी में नहीं लिया जाता। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों को खास काउंटिंग मशीनों का इस्तेमाल करके कैश गिनने के लिए उसी जगह पर बुलाया जाता है। गिनती का प्रोसेस इंडिपेंडेंट गवाहों की मौजूदगी में होता है। इसी के साथ एक सीजर मेमो तैयार किया जाता है। इस डॉक्यूमेंट में जब्त की गई सही रकम रिकॉर्ड होती है।

गिनने के बाद जब्त किए गए कैश को पूरी तरह से सील कर दिया जाता है और उसी राज्य में एसबीआई की एक तय ब्रांच में भेज दिया जाता है। इसके बाद यह पैसा ईडी के नाम पर खोले गए एक खास पर्सनल डिपॉजिट अकाउंट में जमा कर दिया जाता है। इससे यह पक्का होता है कि जब तक केस की जांच चल रही है तब तक ना तो आरोपी और ना ही एजेंसी को जब्त किए गए पैसे से कोई फाइनेंशियल फायदा हो।
जब्त किया गया पैसा कानूनी प्रक्रिया खत्म होने तक बैंक अकाउंट में ही रहता है। अगर कोर्ट आरोपी को दोषी पाता है तो पैसा हमेशा के लिए भारत के कंसोलिडेटेड फंड में ट्रांसफर कर दिया जाता है। यह सरकारी रेवेन्यू का हिस्सा बन जाता है। अगर आरोपी बरी हो जाता है तो जब्त की गई पूरी रकम वापस करनी होती है।
Tag: #nextindiatimes #ED #moneylaundering




