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Tuesday, February 24, 2026

प्लेन को एयर एंबुलेंस बनाने के लिए किससे लेनी होती है इजाजत, कितना आता है खर्च

डेस्क। झारखंड के चतरा जिले में हुई दर्दनाक एयर एंबुलेंस (Air Ambulance) दुर्घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। रांची से दिल्ली जा रहा छोटा विमान सिमरिया थाना क्षेत्र के करमाटांड़ के जंगलों में गिरकर हादसे का शिकार हो गया। इस दुर्घटना में मरीज, उनके दो परिजन, दो पायलट, एक डॉक्टर और एक नर्स- कुल सात लोगों की जान चली गई।

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किसी निजी विमान को एयर एंबुलेंस में बदलना साधारण बदलाव नहीं, बल्कि एक तकनीकी और महंगा प्रोजेक्ट होता है। यह काम विमान की बनावट, उसके आकार और उसमें उपलब्ध कराई जाने वाली चिकित्सा सुविधा के स्तर पर निर्भर करता है। सबसे बड़ा खर्च मेडिकल उपकरणों पर आता है। यदि विमान को आईसीयू स्तर की सुविधा से लैस करना हो तो उसमें वेंटिलेटर, मल्टी-पैरामीटर मॉनिटर, डिफिब्रिलेटर, इन्फ्यूजन पंप, ऑक्सीजन सप्लाई सिस्टम और सक्शन मशीन जैसी अत्याधुनिक मशीनें लगानी पड़ती हैं।

इस पूरी मेडिकल सेटअप की लागत आमतौर पर 1 से 3 लाख अमेरिकी डॉलर या उससे अधिक तक जा सकती है। अगर एडवांस लाइफ सपोर्ट या ईसीएमओ जैसी हाई-एंड सुविधा जोड़नी हो तो खर्च और बढ़ जाता है। कुल मिलाकर किसी छोटे टर्बोप्रॉप विमान को एयर एंबुलेंस में बदलने का पूंजीगत खर्च कई लाख डॉलर से शुरू होकर 10 लाख डॉलर या उससे अधिक तक पहुंच सकता है।

भारत में किसी विमान को एयर एंबुलेंस में बदलने और उसका संचालन करने के लिए सबसे अहम अनुमति Directorate General of Civil Aviation यानी डीजीसीए से लेनी होती है। विमान में संरचनात्मक बदलाव के लिए सप्लीमेंटल टाइप सर्टिफिकेट (STC) की मंजूरी जरूरी होती है। इसके अलावा ऑपरेशन के लिए नॉन-शेड्यूल्ड ऑपरेटर परमिट (NSOP) अनिवार्य है। यह अनुमति Ministry of Civil Aviation के अधीन नियामकीय ढांचे के तहत जारी की जाती है।

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