डेस्क। हर साल 31 अक्टूबर का दिन दुनिया भर में एक बेहद अनूठे और रोमांचक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिसे हैलोवीन (Halloween) के नाम से जाना जाता है। इस दिन का माहौल आम दिनों से बिल्कुल अलग होता है।
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लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से हटकर डरावने मेकअप, अजीबो-गरीब भूतों जैसे लिबास और डरावने मुखौटों में नजर आते हैं। घरों और गलियों को कृत्रिम मकड़ी के जालों, कद्दूओं और कंकालों से सजाया जाता है,
जबकि बच्चे गलियों में घूमकर उत्साह के साथ कैंडीज (चॉकलेट व टॉफियां) मांगते हैं।
भले ही यह उत्सव मुख्य रूप से पश्चिमी देशों की संस्कृति का एक अहम हिस्सा माना जाता रहा हो, लेकिन अब भारत के भी बड़े महानगरों और शहरी संस्कृति में इसका क्रेज तेजी से बढ़ने लगा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर लोग इस दिन डरावना रूप क्यों धारण करते हैं और इसके पीछे का प्राचीन इतिहास क्या है?
प्राचीन केल्टिक सभ्यता से जुड़ा हैलोवीन का इतिहास
हैलोवीन के दिन डरावने और भूतिया लिबास पहनने के पीछे सदियों पुरानी परंपरा जुड़ी हुई है। इतिहास के अनुसार, प्राचीन केल्टिक सभ्यता के लोग आत्माओं से अपनी खुद की रक्षा करने और उन्हें भ्रमित करने के लिए बेहद अजीब और भयानक तरीके से तैयार होते थे।
- जानवरों की खाल का उपयोग:
- वे बुरी आत्माओं से बचने के लिए जानवरों की खाल से बने कपड़े और डरावने मुखौटे पहनते थे।
- आत्माओं को भ्रमित करना:
- उनका मानना था कि ऐसा करने से जब आत्माएं धरती पर आएंगी, तो वे इंसानों को भी अपनी ही तरह कोई दूसरा भूत या आत्मा समझकर छोड़ देंगी और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।
इसी प्राचीन और डरावनी प्रथा ने धीरे-धीरे समय के साथ आधुनिक दौर के फैंसी ड्रेस और मजेदार डरावने कॉस्ट्यूम पहनने के इस आधुनिक चलन को जन्म दिया है।
आग जलाने और फसल की बलि देने की पुरानी परंपरा
प्राचीन काल में मनाए जाने वाले ‘सोविन’ (Samhain) उत्सव के दौरान लोग गांव के बीचों-बीच बड़े पैमाने पर पवित्र आग जलाते थे,
जिसे बॉनफायर (Bonfire) कहा जाता था।
- देवताओं को प्रसन्न करना:
- इस जलती हुई पवित्र आग में लोग अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपनी कटी हुई फसलों का कुछ हिस्सा और पशुओं की आहुति देते थे।
- कबीले की रक्षा का विश्वास:
- उनका दृढ़ विश्वास था कि ऐसा अनुष्ठान करने से देवता आने वाले कड़ाके की ठंड के उस मुश्किल मौसम में उनके पूरे कबीले की सुरक्षित रक्षा करेंगे और सभी बुरी ताकतों को उनके गांवों से दूर रखेंगे।
ईसाई धर्म का प्रभाव और ‘हैलोवीन’ नामकरण का सफर
आठवीं शताब्दी के दौरान जब यूरोप में ईसाई धर्म का तेजी से प्रसार हुआ,
तब कैथोलिक चर्च ने इस पुराने केल्टिक त्योहार को एक नए धार्मिक स्वरूप में ढालने का प्रयास किया।
- चर्च ने हर साल 1 नवंबर को सभी ईसाई संतों और शहीदों की याद में ‘ऑल सेंट्स डे’ (All Saints’ Day)
- या ‘ऑल हैलोज’ के रूप में मनाने का फैसला किया।
- इसके ठीक एक रात पहले यानी
- 31 अक्टूबर की शाम को ‘ऑल हैलोज ईव’ (All Hallows’ Eve) कहा जाने लगा।
- समय बीतने के साथ यह नाम और अधिक संक्षिप्त होता गया और आखिरकार इसे आधुनिक रूप में ‘हैलोवीन’ कहा जाने लगा।
कद्दू और ‘जैक-ओ-लैंटर्न’ की बेहद दिलचस्प कहानी
आज के समय में कद्दू के बिना हैलोवीन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
हैलोवीन की मुख्य पहचान बन चुके कद्दू पर डरावनी नक्काशी करके
उसके अंदर मोमबत्ती या दीपक जलाने की इस अनोखी परंपरा को ‘जैक-ओ-लैंटर्न’ (Jack-o’-lantern) कहा जाता है।

- मूल रूप से शलजम का होता था इस्तेमाल:
- इतिहास के पन्नों को पलटें तो मूल रूप से आयरलैंड के लोग बुरी आत्माओं को डराने के लिए कद्दू की जगह शलजम और
- आलू पर भयानक चेहरे तराशकर उनमें दीपक रखा करते थे।
- अमेरिका में कद्दू की शुरुआत:
- जब उन्नीसवीं सदी में बड़ी संख्या में आयरिश लोग प्रवास करके अमेरिका पहुंचे,
- तो उन्हें वहां शलजम के मुकाबले कद्दू बहुत आसानी से और बड़ी मात्रा में मिल गए।
तभी से शलजम की जगह कद्दू का इस्तेमाल इस त्योहार में सबसे प्रमुखता से होने लगा,
जो आज पूरी दुनिया में हैलोवीन की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है।
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