नई दिल्ली। 6 अक्टूबर, 1973 को जब मिस्र और सीरिया ने इजरायल पर अचानक हमला किया, तो वह केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि इजरायल के उस अजेय होने के भ्रम को तोड़ना था जो 1967 के ‘छह दिवसीय युद्ध’ के बाद पैदा हुआ था। इजरायल ने महज 6 दिनों में मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की सेनाओं को धूल चटा दी थी।
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इस प्रचंड जीत ने इजरायल के भीतर यह धारणा पैदा कर दी कि कोई भी अरब सेना उसे चुनौती नहीं दे सकती। यही वह ‘भ्रम’ था जिसके कारण 1973 में जब मिस्र और सीरिया ने हमला किया, तो इजरायल की तैयारी आधी-अधूरी थी। इजरायल ‘योम किप्पुर’ का त्योहार मना रहा था और पूरा देश बंद था।
1973 के युद्ध में सोवियत संघ समर्थित मिस्र की सेना ने स्वेज नहर पार कर इजरायल की अभेद्य मानी जाने वाली ‘बार्लेव लाइन’ को ध्वस्त कर दिया था। 17 अक्टूबर 1973 को ओपेक देशों ने घोषणा की कि वो हर महीने तेल के उत्पादन में 5% की कटौती करेंगे और अमेरिका-नीदरलैंड जैसे देशों के लिए तेल का एक्सपोर्ट पूरी तरह बंद कर देंगे। कच्चे तेल की कीमत जो लगभग 3 डॉलर प्रति बैरल थी, वह उछलकर सीधे 12 डॉलर के पार पहुंच गई।

अमेरिका में पेट्रोल की ऐसी किल्लत हुई कि सरकार को ‘राशनिंग’ करनी पड़ी। लोग अपनी गाड़ियों में तेल डलवाने (Oil Crisis) के लिए आधी रात से लाइन में लगते थे। पहली बार अमेरिका में हाईवे पर गाड़ियों की स्पीड लिमिट कम की गई ताकि ईंधन बचाया जा सके। यूरोप के कई देशों में ‘कार-फ्री संडे’ लागू किया गया, जहां रविवार को सड़कों पर गाड़ी ले जाना मना था। लोग घोड़ों और साइकिलों पर दफ्तर जाने लगे।
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