डिलीवरी के बाद की थकान डिप्रेशन तो नहीं? इन लक्षणों पर जरूर दें ध्यान

लाइफस्टाइल डेस्क। प्रेग्नेंसी और मां बनना किसी भी महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत पड़ाव होता है। यह एक ऐसा समय है जब महिला एक नई जिंदगी को दुनिया में लेकर आती है। हालांकि, इस दौरान शरीर और मन दोनों स्तरों पर कई बड़े बदलाव होते हैं। हार्मोनल उतार-चढ़ाव के कारण शरीर के साथ-साथ भावनाओं में भी तीव्र परिवर्तन आते हैं।

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आमतौर पर प्रेग्नेंसी के दौरान और उसके बाद खान-पान और शारीरिक सेहत पर पूरा ध्यान दिया जाता है, लेकिन अक्सर महिला की मानसिक सेहत (Mental Health) के बारे में बहुत कम बात की जाती है।

मानसिक स्वास्थ्य की पहचान और समय पर बचाव:

लगातार घबराहट, उदासी, सोने में दिक्कत, अत्यधिक तनाव या मां बनने की नई जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बैठाना कई बार महिला के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है। ऐसे में सही समय पर लक्षणों की पहचान करना और समय पर उचित कदम उठाना इस समस्या से बाहर निकलने में बेहद मददगार साबित हो सकता है।

मुख्य कारण:

गर्भावस्था और प्रसव के बाद के दौर में कई ऐसे शारीरिक और

मनोवैज्ञानिक कारक होते हैं जो मानसिक तनाव को बढ़ाते हैं:

  • प्रेग्नेंसी एंग्जायटी: बच्चे के सही विकास, डिलीवरी के दौरान आने वाली संभावित मुश्किलों और मां बनने की नई जिम्मेदारियों को लेकर महिला के मन में एक अज्ञात डर और चिंता लगातार बनी रहती है।
  • शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी (एनीमिया):
  • प्रेग्नेंसी के दौरान खून की कमी होने से कमजोरी, थकान और चक्कर जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं,
  • जो सीधे तौर पर महिला की भावनात्मक सेहत पर असर डालती हैं।
  • प्रेग्नेंसी कॉम्प्लिकेशंस:
  • हाई ब्लड प्रेशर, प्री-एक्लेम्पसिया या जेस्टेशनल डायबिटीज जैसी मेडिकल स्थितियों में शारीरिक कष्ट के साथ मानसिक तनाव (depression) भी काफी बढ़ जाता है।
  • लेबर पेन (प्रसव पीड़ा) का डर:
  • डिलीवरी के दर्द, उस दौरान आने वाली जटिलताओं या बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर लगने वाला डर महिला के मनोवैज्ञानिक संतुलन को प्रभावित करता है।
  • नींद की भारी कमी:
  • गर्भावस्था के अंतिम महीनों में शारीरिक बदलावों और बार-बार पेशाब आने की समस्या के कारण नींद पूरी नहीं होती।
  • इसके बाद डिलीवरी के बाद बच्चे को दूध पिलाने या उसकी देखभाल के लिए रात-रात भर जगने से थकान और तनाव और अधिक बढ़ जाता है।
  • पोस्टपार्टम डिप्रेशन:
  • बच्चे के जन्म के बाद कई महिलाएं गंभीर रूप से पोस्टपार्टम डिप्रेशन का शिकार हो जाती हैं।
  • डिलीवरी के बाद लगातार उदासी, बिना वजह रोने का मन करना, अत्यधिक चिड़चिड़ापन,
  • बच्चे से आत्मीयता (अटैचमेंट) महसूस न होना या निराशा जैसी भावनाएं घर कर जाती हैं।
  • इसे महज थकान समझकर कभी भी अनदेखा नहीं करना चाहिए।
  • पोस्टपार्टम एंग्जायटी:
  • बच्चे के स्वास्थ्य, उसकी सुरक्षा या भविष्य को लेकर हर समय एक अत्यधिक डर या चिंता बनी रहना भी मानसिक सेहत को प्रभावित करता है।
  • ब्रेस्टफीडिंग और शारीरिक रिकवरी:
  • डिलीवरी के बाद शरीर में होने वाला दर्द, शारीरिक बनावट में बदलाव और स्तनपान (Breastfeeding) के दौरान आने वाली शुरुआती परेशानियां महिलाओं के मानसिक तनाव को और ज्यादा बढ़ा देती हैं।

डॉक्टर से संपर्क कब करना चाहिए?

यदि प्रेग्नेंसी के दौरान या डिलीवरी के बाद किसी महिला में नीचे दिए गए लक्षण लंबे समय तक दिखाई दें,

तो इसे सामान्य न समझकर तुरंत किसी विशेषज्ञ या डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए:

  • हर समय अत्यधिक उदास रहना या गंभीर एंग्जायटी बने रहना।
  • बिना किसी स्पष्ट वजह के बार-बार रोना या बहुत अधिक चिड़चिड़ापन महसूस होना।
  • उठने-बैठने या रोजमर्रा के घरेलू व व्यक्तिगत कामों में रुचि पूरी तरह खत्म हो जाना।
  • रात में लाख कोशिश के बाद भी नींद न आना या नींद बार-बार टूटना।
  • अपने नवजात शिशु की या खुद की सही तरीके से देखभाल न कर पाना।

नई मां की मानसिक सेहत में सुधार कैसे करें?

परिवार और समाज के सहयोग से इस चुनौती से आसानी से पार पाया जा सकता है:

  1. नियमित मेंटल हेल्थ चेकअप: प्रेग्नेंसी के दौरान और बच्चे के जन्म के बाद होने वाले रूटीन मेडिकल चेकअप में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक सेहत पर भी खुलकर चर्चा होनी चाहिए। डॉक्टर को फिजिकल हेल्थ के साथ मेंटल हेल्थ की भी जानकारी देनी चाहिए ताकि समय रहते समस्या को पकड़ा जा सके।
  2. परिवार और पार्टनर का सहयोग: प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद के नाजुक दौर में पार्टनर और परिवार की भूमिका सबसे अहम होती है। घर के कामों और बच्चे की देखभाल में हाथ बँटाना चाहिए, ताकि नई मां को पर्याप्त आराम मिल सके। इसके अलावा, उनकी भावनाओं को सुनना और उन्हें भावनात्मक रूप से समझना बेहद जरूरी है।
  3. हेल्दी लाइफस्टाइल: पौष्टिक खान-पान, पर्याप्त आराम, हल्की फिजिकल एक्टिविटी और ध्यान (Meditation) जैसी रिलैक्सेशन तकनीकें मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने में बहुत मददगार होती हैं।

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