नई दिल्ली। संसद (Parliament) के मानसून सत्र के दूसरे दिन की शुरुआत के साथ ही दोनों सदनों में जबरदस्त शोर-शराबा देखने को मिला। विपक्ष के विधायकों और सांसदों की लगातार नारेबाजी की वजह से लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही पहले दोपहर 12 बजे और फिर 2 बजे तक के लिए टालनी पड़ गई। दोपहर 2 बजे बैठक दोबारा शुरू हुई लेकिन हंगामा थमने का नाम नहीं ले रहा था।
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इसके बाद दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने कार्यवाही को अगले दिन सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया। संसद के इस तरह से बार-बार ठप होने पर न सिर्फ जरूरी काम रुकते हैं बल्कि देश की तिजोरी और करदाताओं की जेब पर भी बहुत वित्तीय बोझ पड़ता है।
संसद के सत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए हर सेकेंड सरकारी खजाने से पैसा पानी की तरह से बहता है। सरकारी आंकड़ों और आधिकारिक अनुमानों की मानें तो संसद चलाने की प्रति मिनट लागत लगभग 2.5 लाख रुपये के आसपास बैठती है। इस हिसाब से अगर सदन सिर्फ एक घंटे के लिए भी हंगामे की वजह से बाधित होता है तो देश को करीब 1.5 करोड़ रुपये का सीधा वित्तीय नुकसान झेलना पड़ता है। साल 2014 से 2024 के आंकड़ों पर नजर डालें तो बार-बार के स्थगन और शोर-शराबे की वजह से सार्वजनिक धन के लगभग 3,300 करोड़ रुपये पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं।

सदन में कामकाज न होने की वजह से सिर्फ देश को आर्थिक नुकसान नहीं होता है, बल्कि देश के विकास से जुड़े विधायी कार्य भी अधर में लटक जाते हैं। जब संसद की कार्यवाही स्थगित होती है तो जनता के हित में पेश किए जाने वाले विधेयक पर बहस और चर्चा रुक जाती है। कानून बनाने की प्रक्रिया में देरी होने की वजह से सरकार की नई योजनाएं, नीतियां और नीतिगत फैसले समय पर लागू नहीं हो पाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि पूरे देश के प्रशासनिक और विकास के काम रुक जाते हैं।
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