लाइफस्टाइल डेस्क। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में देर रात तक स्क्रीन स्क्रॉल करने की आदत और काम का बढ़ता प्रेशर नींद की कमी का सबसे बड़ा कारण हैं। अक्सर लोग काम या बिंज वॉचिंग के लिए बिना सोचे अपनी नींद (Sleep) कुर्बान कर देते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं इसका आपके दिमाग पर क्या असर हो रहा है?
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जब हम गहरी नींद में होते हैं, तो हमारा दिमाग खुद को साफ करता है। इस प्रक्रिया के दौरान दिमाग में दिन भर जमा होने वाले टॉक्सिन्स, जैसे कि बीटा-एमाइलॉयड, को बाहर निकाला जाता है। अगर नींद पूरी न हो, तो ये टॉक्सिन्स दिमाग में जमा होने लगते हैं, जो आगे चलकर अल्जाइमर जैसी गंभीर और भूलने वाली न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
दिमाग का एक हिस्सा जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहते हैं, हमारे लॉजिकल फैसलों और भावनाओं को कंट्रोल करता है। नींद की कमी के कारण इस हिस्से की एक्टिविटी कम हो जाती है। वहीं, डर और गुस्से को नियंत्रित करने वाला हिस्सा अमिग्डाला हाइपरएक्टिव हो जाता है। यही वजह है कि नींद पूरी न होने पर इंसान छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाता है, तनाव महसूस करता है और उसकी भावनाओं पर उसका नियंत्रण नहीं रहता।

नींद की एक अहम अवस्था होती है REM स्लीप। यह फेज हमारी यादों को सहेजने और नई चीजें सीखने के लिए जिम्मेदार होता है। जब हम कम सोते हैं, तो हमारे न्यूरॉन्स के बीच का संपर्क कमजोर हो जाता है। इसके चीजें याद रखने में परेशानी होती है, फोकस करना मुश्किल हो जाता है, फैसले लेने की क्षमता प्रभावित होती है और रिएक्शन टाइम धीमा हो जाता है, जिससे ड्राइविंग या मशीनरी चलाते समय एक्सीडेंट्स का खतरा बढ़ जाता है।
शुरुआत में दिमाग खुद को जगाए रखने के लिए डोपामाइन का स्तर बढ़ाता है, लेकिन लंबे समय तक भूखे रहने या न सोने से डोपामाइन, सेरोटोनिन और नोराड्रेनालाईन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का बैलेंस पूरी तरह बिगड़ जाता है। इससे मूड डिसऑर्डर और डिप्रेशन का खतरा बढ़ता है।
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