नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) की खूब चर्चा हो रही है। अमेरिका के बोस्टन शहर से अभिजीत दिपके द्वारा शुरू की गई यह वर्चुअल पार्टी अपने मजाकिया और सरकार-विरोधी तेवरों से इंस्टाग्राम पर बीजेपी से भी आगे निकल गई। इस अनोखे नाम के बाद लोगों के जेहन में यह सवाल तैरने लगा है कि क्या भारत में पहले भी जानवरों के नाम या उनके प्रतीकों पर पार्टियां बनी हैं?
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देश की मुख्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों ने जानवरों के सिंबल पर चुनाव लड़कर बड़ी जीत हासिल की है। इसका सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण मायावती की ‘बहुजन समाज पार्टी’ (BSP) है, जिसका आधिकारिक चुनाव चिह्न हाथी है। राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रतीक ने एक बड़े वोट बैंक को एकजुट करने का काम किया। इसके अलावा पूर्वोत्तर के राज्य असम में ‘असम गण परिषद’ (AGP) भी एक प्रमुख क्षेत्रीय दल है, जो चुनाव आयोग द्वारा आवंटित इसी हाथी निशान के साथ वर्षों से चुनावी मैदान में अपनी मजबूत किस्मत आजमा रहा है।
हाथी के अलावा देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़े संगठनों ने भी हिंसक और शक्तिशाली जीवों को अपने दल की पहचान बनाया। महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित की गई पार्टी ‘ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस ऐतिहासिक राजनीतिक दल का आधिकारिक चुनाव चिह्न ‘शेर’ है। आज भी यह पार्टी इसी सिंबल के साथ चुनावी मैदान में उतरती है और भारतीय निर्वाचन आयोग के पुराने नियमों के तहत इसे इस हिंसक पशु के निशान को इस्तेमाल करने की पूरी कानूनी छूट मिली हुई है।

आजाद भारत के शुरुआती दौर में देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ का जुड़ाव भी सीधे तौर पर कृषि और पशुधन से रहा था। अपने शुरुआती दौर के चुनावों में कांग्रेस पार्टी का आधिकारिक चुनाव चिह्न ‘दो बैल’ हुआ करता था, जो उस समय के ग्रामीण और किसान भारत का प्रतिनिधित्व करता था। जब कांग्रेस में बड़ा विभाजन हुआ, तो इंदिरा गांधी वाले गुट को चुनाव आयोग की तरफ से ‘गाय और बछड़ा’ का नया प्रतीक आवंटित किया गया था।
तमिलनाडु की बेहद प्रभावशाली और बड़ी पार्टी ‘अन्नाद्रमुक’ (AIADMK) ने अतीत के चुनावों में अपने दल के लिए ‘मुर्गा’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल किया था। हालांकि, बाद के वर्षों में राजनीतिक समीकरणों और चुनाव आयोग की नई व्यवस्थाओं के चलते इस प्रतीक को बदल दिया गया।
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