डेस्क। दिल्ली में सांसद चलो विरोध प्रदर्शन के दौरान इलेक्ट्रिक शॉक स्टिक के इस्तेमाल के आरोपों ने सुरक्षा बल द्वारा भीड़ को काबू करने के तरीके पर नई बहस छेड़ दी है। कई छात्रों का यह दावा है कि सोमवार के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस (Delhi Police) और रैपिड एक्शन फोर्स ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए इलेक्ट्रिक स्टिक का इस्तेमाल किया। इसी बीच आइए जानते हैं कि इलेक्ट्रिक स्टिक क्या है और यह कैसे काम करती है?
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इलेक्ट्रिक स्टिक कानून लागू करने वाली एजेंसी द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक ऐसा उपकरण है जिससे किसी की जान नहीं जाती। इसे सामान्य स्थिति में किसी व्यक्ति को कुछ समय के लिए बेअसर करने के लिए बनाया गया है। इससे उन्हें कोई स्थायी चोट नहीं पहुंचती। यह हाई वोल्टेज का इलेक्ट्रिक डिसचार्ज देते हैं जो शरीर के तांत्रिक और मांसपेशियों के तंत्र में रुकावट डालता है। इससे व्यक्ति कुछ समय के लिए मांसपेशियों पर अपना कंट्रोल खो देता है।
सुरक्षा एजेंसी द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सामान्य शौक बैटन मॉडल और उनके मकसद के आधार पर लगभग 20000 वोल्ट से लेकर 20 लाख वोल्ट तक करंट पैदा कर सकते हैं। हालांकि यह वोल्टेज काफी ज्यादा लगती है लेकिन सिर्फ वोल्टेज से यह तय नहीं होता कि इलेक्ट्रिक शॉक कितना खतरनाक है।

सबसे जरूरी बात शरीर से बहने वाले करंट की मात्रा है। इलेक्ट्रिक स्टिक को काफी कम करंट देने के लिए बनाया गया है। इसे आमतौर पर मिलीएम्पियर में मापा जाता है। इस वजह से सामान्य स्थिति में इन्हें जानलेवा न होने वाले हथियारों की श्रेणी में रखा जाता है।
हाई वोल्टेज डिस्चार्ज पैदा करने के बावजूद इलेक्ट्रिक स्टिक को काफी कम समय और काफी कम करंट लेवल पर बिजली देने के लिए बनाया गया है। इस कॉम्बिनेशन से नस और मांसपेशी के बीच का संपर्क कुछ समय के लिए टूट जाता है। इससे दर्द, मांसपेशियों में बिना मर्जी के खिंचाव और कुछ समय के लिए कमजोरी महसूस होती है। सामान्य स्थिति में कुछ समय बाद इसका असर खत्म हो जाता है और कोई भी स्थायी चोट नहीं लगती।
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