कभी बैडमिंटन से था प्यार, फिर बड़ी बहन से प्रेरित हो थामा स्क्वॉश रैकेट; अनाहत ने ऐसे रचा इतिहास

स्पोर्ट्स डेस्क। भारतीय खेलों के इतिहास में कई बार ऐसा होता है जब कोई खिलाड़ी अपनी प्रतिभा और मेहनत से पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर देता है। ऐसी ही एक नई मिसाल कायम की है भारत की 18 वर्षीय युवा स्क्वॉश खिलाड़ी अनाहत सिंह (Anahat Singh) ने।

यह भी पढ़ें-एक फोन कॉल ने खत्म किया था सचिन तेंदुलकर का वनडे करियर, देखें किसकी थी वो कॉल

हाल ही में आइची-नागोया में आयोजित एशियाई खेलों में अनाहत ने अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने महिला सिंगल्स वर्ग में रजत पदक (Silver Medal) जीतकर भारत के खेल जगत में नया इतिहास रच दिया।

फाइनल मुकाबले में अनाहत को मलेशिया की शीर्ष खिलाड़ी शिवासांगरी सुब्रमण्यम के खिलाफ 4-11, 4-11, 7-11 से हार का सामना जरूर करना पड़ा, लेकिन इस पूरे टूर्नामेंट में उनका प्रदर्शन बेहद सराहनीय रहा। इतनी कम उम्र में इस मुकाम तक पहुंचना उनकी लगन और कड़ी मेहनत को दर्शाता है।

खेल की शुरुआत: बैडमिंटन से स्क्वॉश तक का सफर

अनाहत की मां तानी वढेरा सिंह के अनुसार, अनाहत को बचपन से ही खेलों से बहुत लगाव था। वह अपने स्कूल के दिनों में हर प्रकार की खेल प्रतियोगिताओं में उत्साह के साथ भाग लेती थीं।

शुरुआत में उनका मुख्य झुकाव बैडमिंटन की ओर था। वह टीवी पर भारत की स्टार खिलाड़ी पीवी सिंधू को खेलते हुए देखा करती थीं। सिंधू के शानदार खेल से प्रभावित होकर ही अनाहत के मन में देश के लिए खेलने की इच्छा जागी।

badminton की कोचिंग के दौरान उनके कोच विकास शर्मा ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने अनाहत को खेल को गंभीरता से लेने और भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए लगातार प्रेरित किया।

बड़ी बहन बनीं स्क्वॉश की प्रेरणा:

अनाहत का स्क्वॉश खेल में आना एक इत्तेफाक था। उनकी बड़ी बहन अमीरा पहले से ही स्क्वॉश खेला करती थीं। जब पूरा परिवार अमीरा के टूर्नामेंट्स के सिलसिले में यात्रा करता था, तो छोटी अनाहत भी उनके साथ जाया करती थीं।

वहां जाकर अनाहत ने भी कभी-कभी टाइमपास के लिए स्क्वॉश रैकेट थामना शुरू किया।

देखते ही देखते यह खेल उन्हें बहुत भा गया।

कुछ समय तक उन्होंने बैडमिंटन और स्क्वॉश दोनों को एक साथ खेला।

लेकिन बाद में उनका पूरा ध्यान स्क्वॉश पर ही टिक गया और उन्होंने इसी खेल को अपने करियर के रूप में चुना।

पिता ने बेटी के सपने के लिए छोड़ा काम:

किसी भी सफल खिलाड़ी के पीछे उसके परिवार का बहुत बड़ा हाथ होता है। अनाहत की सफलता के पीछे भी उनके माता-पिता का बहुत बड़ा त्याग छुपा हुआ है।

  • पिता का समर्पण:
  • अनाहत के पिता गुरशरण सिंह पेशे से एक वकील हैं और खुद पूर्व हॉकी खिलाड़ी रहे हैं।
  • अनाहत को हर साल 10 से 15 जूनियर और सीनियर टूर्नामेंट खेलने के लिए देश-विदेश की यात्राएं करनी पड़ती थीं।
  • अनाहत की कम उम्र को देखते हुए उनके पिता हमेशा उनके साथ जाते थे।
  • इस वजह से उन्हें अपनी वकालत की प्रैक्टिस तक कम करनी पड़ी।
  • शुरुआती आर्थिक चुनौतियां:
  • खिलाड़ी जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम नहीं बना लेता, तब तक सारा आर्थिक बोझ परिवार पर ही होता है।
  • अनाहत के शुरुआती 7-8 साल परिवार के लिए काफी संघर्षपूर्ण रहे।
  • ट्रेनिंग, डाइट और यात्राओं का सारा खर्च उनके माता-पिता ने ही उठाया।

अब अनाहत की शानदार सफलताओं को देखते हुए सरकार, JSW और कई अन्य संस्थाएं उनकी मदद के लिए आगे आई हैं।

उनकी मां का कहना है कि बेटी की इस कामयाबी को देखकर पुराने सारे संघर्ष अब सार्थक लगते हैं।

भविष्य के बड़े लक्ष्य: ओलंपिक और CWG

रजत पदक जीतने के बाद अब अनाहत का पूरा ध्यान अपनी विश्व रैंकिंग में सुधार करने पर है।

परिवार और उनके कोच की योजना जल्दबाजी करने की बिल्कुल नहीं है।

  1. कमजोरियों पर काम:
  2. अनाहत अभी बहुत युवा हैं। उनके खेल में अभी और निखार लाने की गुंजाइश है।
  3. ओलंपिक क्वालीफिकेशन:
  4. उनका मुख्य उद्देश्य अपनी रैंकिंग बेहतर करके आगामी ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई करना है।
  5. राष्ट्रमंडल खेल (CWG):
  6. इसके अलावा राष्ट्रमंडल खेलों में भी देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना उनका एक बड़ा लक्ष्य है।

अनाहत सिंह की यह कहानी साबित करती है कि अगर परिवार का साथ हो और इरादे मजबूत हों, तो किसी भी खेल में इतिहास रचा जा सकता है।

Tag: #nextindiatimes #AnahatSingh #AsianGames2026

RELATED ARTICLE