डेस्क। आज किसी भी बड़े जश्न या Diwali जैसे त्योहार पर आसमान में फूटते रंग-बिरंगे पटाखे खुशियों का हिस्सा बन चुके हैं। सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस, फ्रांस के ‘बैस्टील डे’ और चीन के लूनर न्यू ईयर में भी आतिशबाजी से आसमान जगमगा उठता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पटाखों का इतिहास बेहद दिलचस्प और अनोखा रहा है?
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भूत भगाने से हुई थी शुरुआत:
पटाखों की कहानी ईसा पूर्व दूसरी सदी के चीन से शुरू होती है।
- उस दौर में लोग बांस के टुकड़ों को आग में डालते थे।
- अंदर की हवा गर्म होकर फैलती थी, जिससे तेज धमाका होता था।
- लोगों का मानना था कि इस आवाज से बुरी आत्माएं और भूत-प्रेत भाग जाते हैं।
गलती से हुई बारूद की खोज
चीन में रसायनशास्त्रियों ने अनजाने में गंधक, शोरा और चारकोल को मिलाकर बारूद की खोज की। हान राजवंश के दौरान जब इस मसाले को बांस या कागज की नली में भरकर आग लगाई गई, तो धमाके के साथ रोशनी भी निकली। यहीं से असली आतिशबाजी की शुरुआत हुई।

युद्ध के मैदान से भारत पहुंचा बारूद
- प्राचीन उल्लेख:
- कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में ‘अग्निचूर्ण’ नाम के ज्वलनशील पाउडर का जिक्र मिलता है।
- सैन्य इस्तेमाल:
- 13वीं शताब्दी में चीन के अभियानों और बाद में दिल्ली सल्तनत के दौर में बारूद का इस्तेमाल बढ़ा।
- बाबर भी मध्य एशिया से बारूद की तकनीक भारत लाए थे।
शाही शादियों से दीवाली तक का सफर
धीरे-धीरे बारूद का इस्तेमाल हथियारों से निकलकर जश्न और शादियों तक पहुंच गया।
- शादियों में आतिशबाजी: 1518 में पुर्तगाली यात्री डुआर्टे बारबोसा ने गुजरात में शादी के दौरान पटाखे चलते देखे थे। मुगल बादशाह शाहजहां के बेटे की शादी में भी भव्य आतिशबाजी की गई थी।
- दीवाली से जुड़ाव: 17वीं और 18वीं सदी के दौरान दीवाली पर आतिशबाजी का चलन तेजी से बढ़ा।
- शिवकाशी का उदय: 19वीं सदी में कोलकाता में पहली पटाखा फैक्ट्री लगी, जिसे बाद में तमिलनाडु के शिवकाशी में शिफ्ट कर दिया गया।
पटाखों से जुड़े दिलचस्प तथ्य
- वॉल्ट डिज्नी: दुनिया में पटाखों की सबसे बड़ी खरीदार वॉल्ट डिज्नी कंपनी है, जो अपने थीम पार्क्स के लिए हर साल करीब 5 करोड़ डॉलर खर्च करती है।
- विश्व रिकॉर्ड: साल 2016 में फिलीपींस में एक घंटे के भीतर 8 लाख से ज्यादा पटाखे फोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी आतिशबाजी का रिकॉर्ड बनाया गया था।
पर्यावरण और ‘ग्रीन पटाखे’
पुराने समय में पटाखों में प्राकृतिक चीजें इस्तेमाल होती थीं। लेकिन आज के पटाखों में हानिकारक केमिकल्स मौजूद होते हैं। इसी वजह से अब पर्यावरण और सेहत की सुरक्षा के लिए ‘ग्रीन पटाखों’ का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
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