डेस्क। अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते और संधियों की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि अमेरिका और ईरान के बीच बमों औप बारूद की गूंज फिर से सुनाई देने लगी है। जिससे एक बार फिर से दोनों देशों के बीच तनाव गहराने लगा है। हवाई हमलों और पलटवार के इस खूनी खेल ने पूरी दुनिया को फिर से महायुद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।
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इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप ने खुले शब्दों में चेतावनी दे दी है कि अगर ईरान (Israel Iran War) बाज नहीं आया तो उसका नामोनिशान मिटा दिया जाएगा। चलिए जानें कि आखिर दोनों देशों के इस मसले की सुनवाई कहां हो सकती है?
जब दो देश युद्ध विराम के नियमों को न मानने पर उतारू हो जाए तो सबसे पहला और महत्वपूर्ण कानूनी दरवाजा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का होता है। अमेरिका और ईरान दोनों ही इस वैश्विक मंच पर एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जिसमें शांति समझौते को जानबूझकर तोड़ने के सबूत पेश किए जाते हैं। सुरक्षा परिषद के अंदर दुनिया के अन्य ताकतवर देश इस हिंसक अस्थिरता को रोकने के लिए सख्त आर्थिक या सैन्य प्रतिबंधों का प्रस्ताव ला सकते हैं। इस मंच का काम दोनों पक्षों पर बातचीत का दबाव बनाना हे, जिससे कि सैन्य टकराव न हो और बेकसूर लोगों की जानें बच जाएं।

अक्सर युद्ध के मैदान में इस मनमानी को रोकने के लिए नीदरलैंड के द हेग शहर में स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख भी किया जाता है। अगर दोनों देशों के बीच में कोई लिखित समझौता या आपसी सहमति हुई है और कोई भी पक्ष उसकी शर्तों का उल्लंघन करता है, तो इस अदालत में मुकदमा चलाया जा सकता है। यहां पर दोनों देश अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों का हवाला देकर अपनी बात रख सकते हैं।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय विवाद सुलझाने का एक और व्यावहारिक रास्ता किसी तीसरे देश की मध्यस्थता का होता है। इसके तहत दोनों पक्षों की सहमति से किसी ऐसे तीसरे न्यूट्रल देश या किसी विशेषज्ञ पैनल को चुना जाता है, जिस पर दोनों देश भरोसा कर सकें। यह मध्यस्थ पैनल दोनों देशों के प्रतिनिधियों को मेज पर बैठाकर उनके मतभेदों को दूर करने और नए सिरे से कानून तय करने में मदद करता है। इतिहास गवाह है कि कई बार यह कोशिश सफल भी रही है।
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