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Thursday, May 14, 2026

जब दो मुख्यमंत्रियों के हाथ आई थी यूपी की कमान, अटल बिहारी ने किया था आमरण अनशन

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के इतिहास में एक ऐसा दौर भी आया था जब राज्य की कमान वास्तव में दो मुख्यमंत्रियों (Chief Ministers) के हाथों में चली गई थी। यह 1998 का वह साल था, जब लखनऊ के गलियारों में लोकतंत्र का ऐसा नाटक खेला गया जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था।

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इतिहास के पन्नों में 21 फरवरी की रात 10 बजकर 16 मिनट का समय हमेशा दर्ज रहेगा। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने बिना किसी देरी के और बिना कल्याण सिंह को बहुमत साबित करने का मौका दिए, सरकार को बर्खास्त कर दिया। आनन-फानन में जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। यह प्रक्रिया इतनी हड़बड़ी में हुई कि शपथ ग्रहण के बाद होने वाला पारंपरिक राष्ट्रगान तक नहीं हुआ। महज 10 मिनट के भीतर उत्तर प्रदेश का निजाम बदल चुका था। जगदंबिका पाल मुख्यमंत्री बन चुके थे और नरेश अग्रवाल को उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

अगले दिन यानी 22 फरवरी को जब लखनऊ में मतदान हो रहा था, तब देश के कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने इस लोकतांत्रिक हत्या के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लखनऊ से चुनाव लड़ रहे वाजपेयी ने अपना वोट डाला और तुरंत स्टेट गेस्ट हाउस में राज्यपाल के फैसले के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गए। दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने भी प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल को पत्र लिखकर राज्यपाल रोमेश भंडारी की भूमिका पर गहरा असंतोष व्यक्त किया।

सचिवालय का नजारा बेहद अजीब था। मुख्यमंत्री के चेंबर में जगदंबिका पाल अपनी सत्ता जमाए बैठे थे, तो दूसरी तरफ बर्खास्त मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी वहां पहुंच गए। संवैधानिक रूप से उस वक्त पाल ही मुख्यमंत्री थे, लेकिन कल्याण सिंह कैंप ने हार नहीं मानी थी। उन्होंने न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया। 23 फरवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए जगदंबिका पाल की सरकार को अवैध करार दिया और कल्याण सिंह सरकार को बहाल करने का आदेश दे दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अटल जी ने अपना अनशन खत्म किया।

मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने एक अनोखा रास्ता निकाला। कोर्ट ने आदेश दिया कि अगले 48 घंटों के भीतर विधानसभा में कंपोजिट फ्लोर टेस्ट कराया जाए। 26 फरवरी 1998 को विधानसभा में जो नजारा था, वह अद्भुत था। विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी की कुर्सी के दोनों ओर दो विशेष कुर्सियां लगाई गई थीं, जिन पर दोनों मुख्यमंत्री बैठे थे।

पूरी कार्यवाही की निगरानी 16 कैमरों से की जा रही थी। शाम को जब नतीजे आए, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। कल्याण सिंह के पक्ष में 225 वोट पड़े, जबकि जगदंबिका पाल के समर्थन में सिर्फ 196 विधायक आए। बसपा के कुछ विधायकों के वोट रद्द होने के बावजूद कल्याण सिंह का बहुमत स्पष्ट था। फ्लोर टेस्ट के नतीजे घोषित होते ही जगदंबिका पाल की दावेदारी हमेशा के लिए खत्म हो गई। इस प्रकार 21 फरवरी से शुरू हुआ यह सियासी ड्रामा 26 फरवरी को कल्याण सिंह की जीत के साथ समाप्त हुआ।

Tag: #nextindiatimes #ChiefMinisters #UttarPradesh

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