नई दिल्ली। भारत में हर बड़े चुनाव के बाद भारतीय चुनाव आयोग और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बारे में चर्चाएं फिर से सुर्खियों में आ जाती हैं। हाल ही में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे के बाद लोगों ने एक बार फिर से देश में EVM के इतिहास पर बहस शुरू कर दी है।
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भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल सबसे पहले मई 1982 में केरल के परावुर विधानसभा क्षेत्र में हुए एक उपचुनाव के दौरान किया गया था। हालांकि यह पूरी तरह से लागू नहीं किया गया था। उस विधानसभा क्षेत्र के कुल 123 पोलिंग बूथ में से 50 बूथों पर EVM का इस्तेमाल सिर्फ एक प्रयोग के तौर पर किया गया था।

1982 का यह प्रयोग जल्द ही विवादों में घिर गया। चुनाव के बाद हारे हुए उम्मीदवार ए.सी.जोस ने कोर्ट में EVM के इस्तेमाल को चुनौती दी। 1984 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के नतीजों को रद्द कर दिया। इसकी वजह कोई तकनीकी खराबी नहीं बल्कि कानूनी प्रावधानों की कमी थी। उस वक्त जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में सिर्फ बैलट पेपर का जिक्र था और उसमें इलेक्ट्रानिक मशीनों के जरिए वोट डालने की अनुमति देने वाला कोई प्रावधान नहीं था।
बाद में पारंपरिक बैलेट पेपर का इस्तेमाल करके फिर से चुनाव करवाया गया। दिलचस्प बात यह है कि जो उम्मीदवार पहले चुनाव हार गया था वह इस दोबारा हुए चुनाव में जीत गया। हालांकि EVM पहली बार 1982 में सामने आई थी लेकिन बड़े पैमाने पर उनकी वापसी काफी बाद में हुई। 1998 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली में फैली 25 विधानसभा सीटों पर EVM के सफल परीक्षण किए गए। पहला चुनाव जिसमें पूरे राज्य में EVM का इस्तेमाल किया गया वह 1999 का गोवा विधानसभा चुनाव था।
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