नई दिल्ली। लोकतंत्र का महापर्व यानी चुनाव कराने में भारी-भरकम सरकारी मशीनरी और करोड़ों रुपये का खर्च लगता है। एक-एक पोलिंग बूथ को सुरक्षित और चालू हालत में तैयार करने के लिए लाखों रुपये खर्च होते हैं। ऐसे में जब किसी धांधली या हिंसा की वजह से दोबारा मतदान यानी री-पोलिंग करानी पड़ती है, तो वह पूरा खर्च सीधे दोगुना हो जाता है।
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हाल ही में पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर, मगराहाट पश्चिम और फलता विधानसभा क्षेत्रों में दोबारा मतदान कराने के चुनाव आयोग के फैसले ने इस चुनावी खर्च और इसके आर्थिक नुकसान को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। चुनाव आयोग (Election Commission) जब किसी एक बूथ को वोटिंग के लिए तैयार करता है, तो उसमें खर्चों की एक लंबी लिस्ट शामिल होती है। इसमें सबसे पहले ईवीएम (EVM) और वीवीपीएटी (VVPAT) मशीनों का सुरक्षित प्रबंधन और ट्रांसपोर्टेशन आता है।

इसके अलावा वहां तैनात होने वाले मतदान कर्मियों का यात्रा भत्ता, खाने-पीने का इंतजाम, स्टेशनरी और अब वेबकास्टिंग जैसी आधुनिक तकनीक का खर्च भी जुड़ता है। अनुमान बताते हैं कि देश में एक सामान्य चुनाव के दौरान प्रति बूथ औसतन 1 लाख रुपये या उससे अधिक का खर्च आता है।
एक सामान्य पोलिंग बूथ पर होने वाले खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा सुरक्षा व्यवस्था में जाता है। चुनाव को शांतिपूर्ण ढंग से पूरा कराने के लिए वहां भारी संख्या में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और पुलिस के जवानों को तैनात किया जाता है। जवानों के ठहरने, आने-जाने और उनके भत्तों पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च होता है। चुनाव आयोग को री-पोलिंग के लिए नए सिरे से वैसी ही पूरी तैयारी करनी पड़ती है, जैसी सामान्य चुनाव में होती है; जिससे अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता है।
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