नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर जारी संकट ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा रखी है। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कुछ महीनो में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। इसी बीच इंटरनेशनल बाजार में कच्चे तेल की कीमत तेजी से बढ़ रही है और कई देशों के सामने ईंधन आपूर्ति का संकट खड़ा हो गया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।
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अमेरिका दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में उसने घरेलू उत्पादन काफी बढ़ाया है, जिससे उसकी विदेशी तेल पर निर्भरता पहले की तुलना में कम हो गई है। अमेरिका के पास बड़े रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी मौजूद है, जिनका इस्तेमाल आपात की स्थिति में किया जा सकता है। ऊर्जा एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका अपनी घरेलू उत्पादन क्षमता और भंडारण व्यवस्था की वजह से अचानक आने वाले संकटों (Fuel Crisis) को कुछ समय तक संभाल सकता है।
वहीं चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल और गैस आयातक जरूर है लेकिन उसने कई साल पहले ही ऊर्जा सुरक्षा पर काम शुरू कर दिया था। चीन ने अपनी तेल आपूर्ति को अलग-अलग देश और समुद्री मार्ग में बांट दिया ताकि किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर पूरा सिस्टम प्रभावित न हो। रिपोर्ट के अनुसार चीन की तेल भंडारण क्षमता अमेरिका से करीब तीन गुना ज्यादा बताई जाती है।

इसके अलावा चीन लगातार ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर एनर्जी और बैटरी टेक्नोलॉजी पर निवेश बढ़ा रहा है। चीन ने अपने नए फाइव ईयर प्लान में बिजली और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को जोड़ने की रणनीति पर जोर दिया है। वहां डाटा सेंटरों और एआई तकनीक के लिए सस्ती और स्थिर ग्रीन एनर्जी तैयार की जा रही है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का संकट सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत को हर दिन करीब 55 लाख बैरल कच्चे तेल की जरूरत पड़ती है। ऐसे में लंबे समय संकट की स्थिति में भारत के लिए कच्चे तेल की वजह से चुनौती और ज्यादा बढ़ सकती है। वहीं हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ऊर्जा बचत को लेकर लोगों से अपील कर चुके हैं।
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