नई दिल्ली। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करने वाला महिला आरक्षण अधिनियम 2023 लागू हो गया। केंद्रीय विधि मंत्रालय द्वारा जारी एक अधिसूचना में यह जानकारी दी गई।फिलहाल हम समझते हैं कि है कि महिला सांसदों का मौजूदा प्रतिनिधित्व कैसा है और आजादी के बाद से इसमें किस तरह के बदलाव देखने को मिले हैं?
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18वीं लोकसभा में 543 सदस्यों में से 74 महिला सांसद हैं। यह लगभग 13.6% प्रतिनिधित्व बनता है। यह इस बात को दिखाता है कि प्रस्तावित 33% कोटे के मुकाबले महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी कम है। भारत की पहली लोकसभा 1952 में सिर्फ 22 महिला सांसद चुनी गई थीं। यह कुल सदस्यों का महज 4.4% थीं। यह आजादी के शुरुआती सालों में राजनीति में महिलाओं की सीमित भागीदारी को दिखाता है।

समय के साथ महिला सांसदों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ी हैं। 1950 के दशक से लेकर हाल के समय तक हर चुनावी चक्र में संसदीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में धीमी लेकिन लगातार बढ़ोतरी में योगदान दिया है।महिला सांसदों की सबसे ज्यादा संख्या 17वीं लोकसभा में दर्ज की गई। उस वक्त 78 महिलाएं चुनी गई थीं। यह लगभग 14.4% का शिखर था। यह भारत के संसदीय इतिहास में सबसे ज्यादा था।
2024 के Lok Sabha चुनाव में यह संख्या थोड़ी घटकर 74 हो गई थी। छोटी मोटी गिरावटों के बावजूद लंबे समय का रुझान काफी सकारात्मक ही बना हुआ है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व 3 गुना से भी ज्यादा बढ़ा है। 1952 में 22 सांसदों से बढ़कर यह आज 74 हो गया है। इसी बीच आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल ने सबसे ज्यादा महिला सांसद भेजी हैं। पश्चिम बंगाल से यह संख्या 11 की रही है।
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