डेस्क। दिल्ली-एनसीआर में ठंड की शुरुआत के साथ ही प्रदूषण का खतरा लगातार गहराता जा रहा है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के अनुसार राजधानी के कई प्रमुख इलाकों जैसे आईटीओ (ITO), एम्स (AIIMS), अक्षरधाम और आनंद विहार में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब श्रेणी में दर्ज की जा रही है, जिससे लोगों को सांस लेने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बिगड़ते हालातों को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने पाबंदियों का दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया है।
यह भी पढ़ें-सिर्फ फेफड़े नहीं; दिमाग की नसें भी ब्लॉक कर रहा बढ़ता प्रदूषण, रहें सतर्क
AQI क्या है और यह कैसे काम करता है?
हवा की शुद्धता या उसके जहरीलेपन का आकलन करने के लिए एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) का उपयोग किया जाता है। जिस प्रकार शरीर के तापमान को मापने के लिए थर्मामीटर का इस्तेमाल किया जाता है, ठीक उसी तरह हवा में मौजूद प्रदूषण के स्तर को जांचने के लिए AQI पैमाना देखा जाता है।
- शुरुआत:
- भारत में इसकी आधिकारिक शुरुआत साल 2014 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा की गई थी।
- निर्माण:
- इसे आईआईटी कानपुर और देश के प्रतिष्ठित पर्यावरण विशेषज्ञों के परामर्श से तैयार किया गया था,
- ताकि आम नागरिक भी आसानी से अपने शहर की हवा की सेहत को समझ सकें।

हवा में मौजूद आठ प्रमुख प्रदूषक तत्व:
किसी भी क्षेत्र का एयर क्वालिटी इंडेक्स हवा में तैर रहे हानिकारक तत्वों की मात्रा के आधार पर तय होता है। CPCB की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें कुल आठ प्रमुख प्रदूषकों को शामिल किया जाता है:
- PM2.5: हवा में मौजूद अति सूक्ष्म कण।
- PM10: हवा में मौजूद थोड़े बड़े कण।
- नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2): वाहनों और कारखानों से निकलने वाली गैस।
- सल्फर डाइऑक्साइड (SO2): ईंधन के जलने से पैदा होने वाली गैस।
- कार्बन मोनोऑक्साइड (CO): एक बेहद जहरीली गैस।
- ओजोन (O3): जमीन के करीब बनने वाली ओजोन परत।
- अमोनिया (NH3): विभिन्न स्रोतों से उत्सर्जित होने वाला तत्व।
- लेड (Pb): सीसा (ध्यान दें कि लेड की रीयल-टाइम यानी तुरंत आने वाली माप संभव नहीं होती, इसलिए इसकी गणना पिछले आंकड़ों के आधार पर की जाती है)।
AQI की गणना के तीन मुख्य चरण:
AQI निकालने की पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है:
- पहला चरण (औसत निकालना): हवा के विभिन्न तत्वों की सांद्रता का औसत निकाला जाता है। इसमें PM, NO2, SO2, NH3 और Pb का 24 घंटे का औसत लिया जाता है, जबकि कार्बन मोनोऑक्साइड और ओजोन का 8 घंटे का रनिंग औसत देखा जाता है।
- दूसरा चरण (सब-इंडेक्स बनाना): हर प्रदूषक की मात्रा को उसके तयशुदा ब्रेकपॉइंट के आधार पर एक खास सूत्र के जरिए 0 से 500 के पैमाने की संख्या में बदला जाता है, जिसे ‘सब-इंडेक्स’ कहा जाता है।
- तीसरा चरण (फाइनल AQI तय करना): सभी निकाले गए सब-इंडेक्स में से जिस भी प्रदूषक का मान सबसे ज्यादा होता है, उसी सबसे बड़े आंकड़े को उस इलाके का फाइनल AQI मान लिया जाता है। CPCB के अनुसार यह तरीका इसलिए अपनाया जाता है क्योंकि विज्ञान के पास अभी तक सभी प्रदूषकों के सामूहिक असर का संपूर्ण डेटा उपलब्ध नहीं है।
Tag: #nextindiatimes #AQI #Pollution




