सिर्फ गांठ या दर्द ही नहीं, ब्रेस्ट कैंसर के ये छिपे हुए लक्षण भी होने चाहिए मालूम

हेल्थ डेस्क। ब्रेस्ट कैंसर (breast cancer) महिलाओं में सबसे तेजी से बढ़ने वाले कैंसर में से एक है। इसकी सबसे बड़ी वजह सही समय पर जागरूकता का न होना है। जब भी इस बीमारी की बात होती है, तो ज्यादातर महिलाएं मान लेती हैं कि ब्रेस्ट में सिर्फ गांठ होना ही इसका इकलौता लक्षण है। जबकि सच यह है कि ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआत हमेशा गांठ से ही हो, यह बिल्कुल जरूरी नहीं है।

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अक्सर इसके शुरुआती संकेत बहुत मामूली होते हैं, जिन्हें आसानी से अनदेखा कर दिया जाता है।

आइए जानते हैं ब्रेस्ट कैंसर के उन छिपे हुए लक्षणों के बारे में, जिन्हें हर महिला को जानना चाहिए:

कांख या कॉलर बोन के पास गांठ:

  • कैंसर की कोशिकाएं ब्रेस्ट के पास मौजूद लिम्फ नोड्स तक फैल सकती हैं।
  • कई बार ब्रेस्ट में कोई बदलाव नहीं दिखता, लेकिन कांख (Armpit) या कॉलर बोन के पास सूजन या सख्त गांठ महसूस होने लगती है।
  • त्वचा की बनावट में बदलाव:
  • अगर ब्रेस्ट की त्वचा पर सिकुड़न, गड्ढे या त्वचा में संतरे के छिलके (Orange Peel Texture) जैसा खिंचाव या मोटापन नजर आए, तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें।
  • निप्पल का अचानक अंदर धंसना:
  • कुछ महिलाओं के निप्पल जन्म से ही अंदर की तरफ होते हैं, जो सामान्य है।
  • लेकिन अगर कोई निप्पल अचानक अंदर की तरफ खिंचने या मुड़ने लगे,
  • तो यह चिंता का विषय हो सकता है।
  • असामान्य निप्पल डिस्चार्ज:
  • बिना दबाए अपने आप किसी एक निप्पल से खून या कोई पारदर्शी फ्लूइड निकलना इन्फेक्शन या कैंसर का संकेत हो सकता है।
  • साइज़ में अचानक बदलाव:
  • दोनों स्तनों के आकार में थोड़ा अंतर होना सामान्य है। लेकिन अगर बिना किसी वजह के अचानक एक ब्रेस्ट में सूजन, भारीपन या आकार में बड़ा बदलाव दिखे, तो जांच जरूरी है।
  • त्वचा में लगातार लालिमा और गर्म महसूस होना:
  • अगर ब्रेस्ट की स्किन लाल हो जाए, उसमें खुजली हो या छूने पर वह असामान्य रूप से गर्म लगे, तो यह ‘इंफ्लेमेटरी ब्रेस्ट कैंसर’ का संकेत भी हो सकता है।

यह भ्रम दूर करना है जरूरी:

ज्यादातर लोग सोचते हैं कि कैंसर में बहुत दर्द होता है।

सच यह है कि शुरुआती चरण में ब्रेस्ट कैंसर में बिल्कुल भी दर्द नहीं होता।

दर्द का न होना इस बात की गारंटी नहीं है कि सब कुछ ठीक है।

आपको क्या करना चाहिए?

हर महिला को समय-समय पर सेल्फ-एग्जामिनेशन (खुद से जांच) करते रहना चाहिए, ताकि शरीर में होने वाले किसी भी नए बदलाव का तुरंत पता चल सके।

कोई भी नया लक्षण दिखने पर खुद से डॉक्टर बनने के बजाय तुरंत किसी विशेषज्ञ से सलाह लें।

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