साफ पानी भी नहीं सुरक्षित, जानलेवा केमिकल बढ़ा रहे हैं कैंसर का खतरा

हेल्थ डेस्क। साफ और सुरक्षित पानी (water) हर इंसान का बुनियादी अधिकार है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस पानी को आप सुरक्षित मानकर पी रहे हैं, उसमें मौजूद केमिकल्स की मात्रा मापने के नियम 6 दशक से ज्यादा पुराने हो चुके हैं?

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हाल ही में इस बात पर गंभीर चिंता जताई गई है। दुनिया भर के 85 स्वास्थ्य और पर्यावरण संगठनों ने यूनाइटेड नेशन्स हेल्थ एजेंसी (WHO) से पानी में नाइट्रेट की मात्रा तय करने वाले नियमों को फिर से रिव्यू करने की मांग की है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इससे जुड़े पुराने नियम क्या हैं और इन्हें क्यों बदलने की जरूरत महसूस हो रही है।

1958 में तय हुए थे पानी की शुद्धता के मानक:

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पीने के पानी में नाइट्रेट के स्वीकार्य स्तर को पहली बार साल 1958 में तय किया गया था।

  • उस समय के नियमों के अनुसार, पानी में नाइट्रेट की सुरक्षित सीमा 50 मिलीग्राम प्रति लीटर तय की गई थी।
  • उस दौर में यह मात्रा तय करते वक्त मुख्य रूप से बच्चों में होने वाले ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ को ध्यान में रखा गया था।

ब्लू बेबी सिंड्रोम क्या है?

यह एक बेहद खतरनाक स्थिति है, जिसमें खून की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता काफी कम हो जाती है। शरीर में ऑक्सीजन की कमी के कारण त्वचा का रंग नीला पड़ने लगता है, जो बच्चों के लिए जानलेवा भी साबित हो सकता है। हालांकि, आज के समय में ये पुराने मानक नाकाफी साबित हो रहे हैं।

सेहत के लिए क्यों खतरनाक है नाइट्रेट?

आज के दौर में खेती में अंधाधुंध फर्टिलाइजर्स के इस्तेमाल से नाइट्रेट लगातार भूजल (Groundwater) में घुल रहा है।

यह इंसानी शरीर,

खासकर प्रेग्नेंट महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए बहुत खतरनाक माना जाता है।

हाल ही में हुई कई मेडिकल स्टडीज ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं:

  • कैंसर का खतरा:
  • लंबे समय तक पानी में तय सीमा से कम नाइट्रेट लेवल के संपर्क में रहने से भी आंतों के कैंसर (Colorectal Cancer) का खतरा काफी बढ़ जाता है।
  • गर्भावस्था में जोखिम:
  • गर्भवती महिलाओं के लिए यह और भी ज्यादा नुकसानदायक है। इसके कारण समय से पहले प्रसव (Preterm Birth) और गर्भ से जुड़ी अन्य गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।

आज दुनिया भर में करोड़ों लोग ऐसे पानी का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं,

जिसमें नाइट्रेट का स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक है।

नए नियमों और बदलाव की सख्त मांग:

स्वास्थ्य और पर्यावरण संगठनों का साफ कहना है कि 1958 के पुराने नियमों को आज के समय में भी ढोना लोगों की सेहत के साथ सीधे खिलवाड़ करने जैसा है।

  • क्या है नई मांग?
  • पिछले साल सामने आई एक प्रमुख स्टडी में नाइट्रेट की सीमा को घटाकर सिर्फ 6.0 मिलीग्राम प्रति लीटर करने की पुरजोर मांग की गई थी,
  • जो मौजूदा 50 मिलीग्राम के स्तर से लगभग 10 गुना कम है।
  • वैश्विक असर:
  • दुनिया के ज्यादातर देश अपने देश के पानी के स्टैंडर्ड अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइंस को देखकर ही तय करते हैं।
  • इसलिए,
  • ग्लोबल लेवल पर नियमों में बदलाव होना बेहद जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित पानी मिल सके।

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