लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधान परिषद (MLC) की पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव के लिए मतगणना निर्धारित सात केंद्रों (लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ, झांसी, बरेली और गोरखपुर) पर शुरू हो चुकी है।
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इन 11 सीटों के लिए 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था, जिसमें कुल 55 प्रतिशत वोट पड़े थे और 152 प्रत्याशी मैदान में हैं। आइए जानते हैं कि विधान परिषद क्या है और इसके चुनाव तथा मतगणना की प्रक्रिया आम चुनावों से इतनी अलग क्यों होती है।
विधान परिषद: एक नजर में
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 169 में विधान परिषद के गठन और समाप्ति का प्रावधान किया गया है, जबकि इसकी संरचना का उल्लेख अनुच्छेद 171 में मिलता है।
- उच्च सदन और निरंतरता:
- इसे राज्य विधानमंडल का ‘उच्च सदन’ कहा जाता है। देश की राज्यसभा की तरह ही विधान परिषद भी कभी पूरी तरह भंग नहीं होती है।
- सदस्यों का कार्यकाल:
- इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है और हर 2 साल पर एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं। सदन का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए।
- किन राज्यों में है विधान परिषद?
- वर्तमान में भारत के केवल 6 राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) में ही विधान परिषद का अस्तित्व है।
- इसकी अधिकतम संख्या विधानसभा की कुल संख्या का 1/3 और न्यूनतम संख्या 40 हो सकती है।
आम चुनावों से कितना अलग है MLC चुनाव?
विधान परिषद चुनाव के जानकारों के अनुसार, इस चुनाव में भी उम्मीदवार आम चुनाव की तरह ही खड़े होते हैं, लेकिन इसकी मतदान और MLC elections मतगणना प्रक्रिया पूरी तरह भिन्न होती है:
- मतदाताओं की संख्या:
- इसमें आम चुनावों की तरह हर जगह सामान्य बूथ नहीं बनाए जाते, बल्कि बहुत सीमित क्षेत्र यानी प्रखंड स्तर तक ही बूथ बनते हैं।
- मतदाता कौन होते हैं?
- शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र:
- इसमें माध्यमिक या उससे ऊपर के शिक्षक ही मतदाता होते हैं,
- बशर्ते उनकी सेवा को कम से कम 3 वर्ष पूरे हो चुके हों।
- स्नातक निर्वाचन क्षेत्र:
- इसमें वे मतदाता हिस्सा लेते हैं जिन्हें संबंधित क्षेत्र से स्नातक की डिग्री प्राप्त किए हुए कम से कम 3 साल हो चुके हों।

‘वरीयता मतों’ (Preference Votes) की गिनती का गणित:
इस चुनाव में मतदाता ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें ‘ब्लू पेन’ से अपनी पसंद के उम्मीदवारों को वरीयता (Preference) देनी होती है।
- वरीयता दर्ज करना:
- वोटर को बैलेट पेपर पर अपने पसंदीदा उम्मीदवार के सामने ‘1’, दूसरे पसंद के सामने ‘2’ और तीसरे पसंद के सामने ‘3’ लिखना होता है।
- जीत का कोटा:
- चुनाव जीतने के लिए पहली वरीयता के वोटों का एक निश्चित कोटा तय होता है।
- यदि कोई उम्मीदवार पहले दौर में ही वह कोटा हासिल कर लेता है,
- तो वह विजयी घोषित हो जाता है।
- वोटों का ट्रांसफर:
- यदि किसी उम्मीदवार को कोटे से ज्यादा पहली वरीयता के वोट मिलते हैं,
- तो उसके अतिरिक्त वोट उसकी दूसरी वरीयता के आधार पर अन्य उम्मीदवारों में बांट दिए जाते हैं।
- कम वोट वाले बाहर:
- यदि कोई भी उम्मीदवार पहली वरीयता का तय कोटा नहीं छू पाता है,
- तो सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को प्रतियोगिता से बाहर कर दिया जाता है।
- इसके बाद उसके मतपत्रों पर दर्ज दूसरी वरीयता के वोटों को शेष उम्मीदवारों में ट्रांसफर कर दिया जाता है।
- यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक आवश्यक कोटा पूरा न हो जाए।
मतगणना की जटिल प्रक्रिया
यही कारण है कि स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की काउंटिंग की प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल होती है। कई बार दूसरी और तीसरी वरीयता के वोटों की गिनती करनी पड़ती है, जिसके चलते परिणाम आने में एक से दो दिन तक का समय लग जाता है।




