प्रधानमंत्री पर अभद्र टिप्पणी करने पर कितनी मिलती है सजा, जानें नियम

नई दिल्ली। देश के राजनीतिक गलियारों में उस समय एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया, जब पटना में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक अशोभनीय टिप्पणी कर दी गई.

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कार्यक्रम के दौरान माहौल गरमाने पर एक नागरिक की टिप्पणी के जवाब में दिए गए इस बयान के बाद देश भर में भारी राजनीतिक घमासान छिड़ गया है. इस घटना के सामने आने के बाद से ही आम जनता के मन में यह एक बड़ा और गंभीर सवाल उठ रहा है कि देश के प्रधानमंत्री या किसी भी संवैधानिक पद पर आसीन शीर्ष नेता के खिलाफ अपमानजनक भाषा या अभद्र टिप्पणी करने पर कानूनन किस तरह के प्रावधानों और किन धाराओं के तहत सजा का सामना करना पड़ सकता है.

क्या प्रधानमंत्री पर अभद्र टिप्पणी के लिए कोई विशेष कानून है?

भारतीय न्याय प्रणाली के तहत देश के प्रधानमंत्री (pm) पद पर आसीन व्यक्ति के लिए कोई अलग या विशेष आपराधिक कानून नहीं बनाया गया है. इसका मतलब यह है कि देश के आम नागरिक और प्रधानमंत्री के मान-सम्मान से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया एक समान रूप से ही लागू होती है. हालांकि, कानूनी कार्रवाई में अंतर इस बात से तय होता है कि बयान देने वाले व्यक्ति की मंशा या नीयत क्या थी, उसने किस प्रकार के सार्वजनिक मंच का इस्तेमाल किया और उसके शब्दों का समाज या देश की व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा. पुलिस और अदालतें इन सभी परिस्थितियों और तथ्यों को बारीकी से परखने के बाद ही यह तय करती हैं कि मामला किस श्रेणी में आता है और आरोपी के खिलाफ किस धारा के तहत कानूनी शिकंजा कसा जाना चाहिए.

मानहानि के मामलों में क्या सजा का प्रावधान है?

यदि कोई व्यक्ति देश के प्रधानमंत्री या किसी अन्य प्रतिष्ठित सार्वजनिक हस्ती के खिलाफ ऐसी अमर्यादित या अभद्र टिप्पणी करता है, जिससे उनकी व्यक्तिगत या राजनीतिक प्रतिष्ठा को भारी ठेस पहुँचती है, तो उस व्यक्ति पर कानूनी रूप से मानहानि का मुकदमा दर्ज किया जा सकता है. भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 के अंतर्गत यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है. यदि अदालत में मानहानि का यह आरोप पूरी तरह से सिद्ध हो जाता है, तो दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को अधिकतम दो साल तक की जेल की सजा, आर्थिक जुर्माना या फिर जेल और जुर्माना दोनों एक साथ भुगतने पड़ सकते हैं.

सार्वजनिक शांति भंग और अभद्रता से जुड़े नियम:

किसी भी खुली जनसभा, सड़क, चौराहे या अन्य सार्वजनिक स्थान पर यदि कोई शख्स जानबूझकर अपमानजनक शब्दों, गाली-गलौज या अभद्रता का प्रयोग करता है,

तो इसे एक गंभीर अपराध माना जाता है.

  • BNS की धारा 352:
  • इस धारा के अंतर्गत किसी भी सार्वजनिक स्थल पर अशिष्टता या बदतमीजी फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाती है.
  • शांति भंग करने के मामले:
  • यदि किसी बयान या कृत्य का मुख्य उद्देश्य सीधे तौर पर देश या समाज में हिंसा भड़काना अथवा कानून-व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ना होता है,
  • तो पुलिस शांति भंग करने के इरादे से अपमान की धाराओं के तहत तुरंत कड़ा एक्शन लेती है.
  • इस तरह के मामलों में अदालत के आदेश पर तीन महीने तक की कैद
  • और जुर्माने का प्रावधान तय किया गया है.

सोशल मीडिया और अफवाह फैलाने पर कानूनी सख्ती:

आज के आधुनिक डिजिटल दौर में केवल राजनीतिक मंचों से ही नहीं,

बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से भी आपत्तिजनक टिप्पणियां बहुत तेजी से वायरल हो जाती हैं.

  • BNS की धारा 197:
  • यदि कोई यूजर फेसबुक, एक्स (पूर्व में ट्विटर) या किसी अन्य डिजिटल माध्यम से ऐसी भड़काऊ पोस्ट या बयान साझा करता है
  • जिससे समाज में द्वेष, आपसी नफरत या अशांति फैलने का गंभीर खतरा पैदा होता है,
  • तो उस पर BNS की धारा 197 लागू होती है.
  • सजा और आईटी एक्ट:
  • ऐसी स्थिति में दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल की सजा या भारी जुर्माना लगाया जा सकता है.
  • इसके साथ ही,
  • आईटी एक्ट के कड़े प्रावधानों के तहत साइबर सेल की ओर से भी
  • अलग से कानूनी शिकंजा कसा जा सकता है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी सीमाएं:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत देश के प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र रूप से बोलने और अपनी बात रखने यानी अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता दी गई है, जिसके दायरे में सरकार या नेताओं की नीतियों की निष्पक्ष आलोचना करना भी शामिल है लेकिन, यह अधिकार पूरी तरह से असीमित नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत इस पर कुछ उचित और आवश्यक प्रतिबंध भी लगाए गए हैं, जिनके दायरे में देश की एकता, अखंडता, सार्वजनिक शालीनता और मानहानि जैसे संवेदनशील विषय आते हैं. गुस्से में की गई सामान्य राजनीतिक आलोचना और कानूनी रूप से गंभीर अपराध बनने वाली अभद्र भाषा के बीच की बारीक रेखा तय करने का अधिकार

पूरी तरह से देश की न्यायपालिका के पास सुरक्षित है,

जो हर मामले की गंभीरता और परिस्थितियों को देखकर ही अपना अंतिम फैसला सुनाती है.

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