जंतर-मंतर पर ही क्यों अड़े प्रदर्शनकारी, जानें ऐसा क्या है यहां खास?

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में नागरिक न्याय मंच यानी CJP के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान एक बार फिर जंतर-मंतर (Jantar Mantar) की राजनीतिक महत्ता चर्चा के केंद्र में आ गई है। शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में हालात पूरी तरह उम्मीदों के विपरीत रहे। इस प्रदर्शन में विपक्षी दलों का कोई भी बड़ा नेता शामिल नहीं हो सका।

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CJP के विरोध प्रदर्शन में गायब रहे बड़े विपक्षी चेहरे:

  • तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के आवास से निकलने के बावजूद जंतर-मंतर तक नहीं पहुंच पाईं।
  • कांग्रेस नेता राहुल गांधी दिल्ली से सीधे चेन्नई के लिए रवाना हो गए।
  • समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव दिल्ली आने के बजाय अपने पैतृक गांव सैफई चले गए।
  • विपक्षी दलों के इस तरह ऐन मौके पर किनारा कर लेने से उनकी एकजुटता के दावों की पोल खुल गई।
  • इसके बावजूद कॉकरोच जनता पार्टी ने अगले दिन भी अपना विरोध-प्रदर्शन जारी रखने का ऐलान किया है, जिससे यह सवाल फिर खड़ा हो गया है कि आखिर जंतर-मंतर ही राजनीतिक धरनों और प्रदर्शनों का सबसे प्रमुख केंद्र क्यों बना हुआ है।
  • राजधानी दिल्ली की सियासत उस समय और गरमा गई जब CJP के धरने में कोई भी नामी-गिरामी विपक्षी नेता नजर नहीं आया।
  • ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे बड़े नेता तय कार्यक्रम के बावजूद मौके पर नहीं पहुंच पाए।

अन्ना आंदोलन और रामलीला मैदान का ऐतिहासिक सफर:

  • साल 2011 में देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ा ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ यानी जन लोकपाल विधेयक आंदोलन भारतीय राजनीति का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ था।
  • इस देशव्यापी जन-आंदोलन की शुरुआत सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल 2011 को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन करके की थी।
  • इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार पर एक मजबूत और प्रभावी जन लोकपाल कानून बनाने का दबाव बनाना था, ताकि प्रशासनिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा सके।
  • इस महा-अभियान में अन्ना हजारे के साथ अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और कुमार विश्वास जैसे जाने-माने चेहरे भी जुड़े,
  • जिन्हें मध्यम वर्ग और युवाओं का अभूतपूर्व समर्थन मिला था।

जंतर-मंतर से रामलीला मैदान तक का सफर और प्रशासनिक कारण:

  • अन्ना हजारे का यह बहुचर्चित आंदोलन जंतर-मंतर से ही शुरू हुआ था,
  • लेकिन कुछ ही दिनों में वहां उमड़ने वाली भारी भीड़ के कारण जगह कम पड़ने लगी।
  • स्थिति यह हो गई कि यातायात व्यवस्था चरमरा गई और आम जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
  • ऐसे में प्रशासन और आंदोलन के आयोजकों के बीच आपसी सहमति बनी,
  • जिसके बाद इस विशाल जनसमूह को और अधिक बड़े और सुरक्षित स्थान यानी रामलीला मैदान में शिफ्ट किया गया।
  • प्रदर्शनकारियों का जंतर-मंतर पर अड़े रहने का मुख्य कारण यह है कि
  • यह स्थान संसद भवन और तमाम अहम सरकारी दफ्तरों के बिल्कुल करीब है,
  • जिससे सरकार तक अपनी बात बहुत कम समय में पहुंचाई जा सकती है।

एनजीटी की रोक और सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला:

  • जंतर-मंतर पर लगातार होने वाले धरना-प्रदर्शनों के कारण इलाके की व्यवस्था पर पड़ने वाले असर को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने साल 2017 में यहां विरोध-प्रदर्शन करने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी।
  • एनजीटी का तर्क था कि इन प्रदर्शनों से आसपास की हरियाली नष्ट हो रही है और भारी गंदगी फैल रही है, इसलिए उसने प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान जाने की सलाह दी थी।
  • हालांकि, इस आदेश के खिलाफ मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा।
  • साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के प्रतिबंध पर रोक लगाते हुए दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह प्रदर्शनों के लिए एक नई और संतुलित गाइडलाइन तैयार करे।

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