लाइफस्टाइल डेस्क। बाजार में मिलने वाले बेबी फूड (baby food) को कंपनियां काफी पौष्टिक बताकर बेचती हैं। माता-पिता भी बड़े ब्रांड्स पर भरोसा करके ये प्रोडक्ट्स अपने नवजात बच्चों के लिए खरीदते हैं। लेकिन सुंदर पैकेजिंग और पोषक तत्वों के बड़े-बड़े दावों के पीछे सच कुछ और ही है।
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हाल ही में महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने बेबी फूड प्रोडक्ट्स पर निगरानी सख्त करने का फैसला लिया है। यह कदम सरकारी जांच के उस चौंकाने वाले डेटा के बाद उठाया गया है, जिसमें कई मशहूर बेबी प्रोडक्ट्स क्वालिटी टेस्ट में फेल हो गए।
जांच में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े:
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने साल 2024-25 के दौरान मिल्क फॉर्मूला और बेबी फूड के 522 सैंपल्स की जांच की थी। जांच के नतीजे बेहद चिंताजनक रहे।
- 45 प्रोडक्ट्स फेल:
- कुल 522 में से 45 प्रोडक्ट्स तय मानकों पर खरे नहीं उतरे।
- 5 सैंपल असुरक्षित:
- इनमें 5 सैंपल्स को बच्चों के खाने के लिए पूरी तरह असुरक्षित पाया गया।
- 18 सब-स्टैंडर्ड:
- 18 सैंपल्स की गुणवत्ता बेहद खराब और घटिया स्तर की थी।
- 22 भ्रामक दावों वाले:
- 22 सैंपल्स पर गलत लेबलिंग और न्यूट्रिशन से जुड़े झूठे दावे पाए गए।

जहरीला तत्व, एक्स्ट्रा चीनी और एक्सपायर्ड खाना:
नवजात बच्चों का शरीर बेहद संवेदनशील होता है। जांच में बेबी फूड के अंदर भारी धातुएं (Heavy Metals), कीटनाशक (Pesticides), माइक्रोबियल गंदगी और जरूरत से ज्यादा चीनी पाई गई है।
हाल ही में बेंगलुरु में एक कंपनी पर छापा मारकर 3.7 मीट्रिक टन एक्सपायर हो चुका बेबी फूड जब्त किया गया, जिसे बाद में नष्ट किया गया। एक्सपायर्ड खाना और न्यूट्रिशन के नाम पर बच्चों को एक्स्ट्रा चीनी खिलाना उनकी सेहत के साथ सीधा खिलवाड़ है।
सुरक्षा के लिए आगे का रास्ता क्या हो?
- अमेरिका जैसी रीकॉल नीति:
- अमेरिका में किसी प्रोडक्ट में खराबी मिलने पर तुरंत सार्वजनिक नोटिस जारी कर उस लॉट नंबर का पूरा माल बाजार से वापस मंगवाया जाता है। भारत में भी ऐसी पारदर्शी व्यवस्था लागू होनी चाहिए।
- कड़े कानून और जुर्माना:
- मिलावट करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना और सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
- पेरेंट्स की सतर्कता:
- नामी ब्रांड्स पर आंख मूंदकर भरोसा न करें। खरीदारी के समय एक्सपायरी डेट, इंग्रीडिएंट्स और शुगर की मात्रा की जांच खुद जरूर करें।
बच्चों की सेहत के साथ किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
रेगुलेटर्स की सख्त नजर ही कंपनियों को जिम्मेदार बना सकती है।
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