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Tuesday, May 12, 2026

पहली पंक्ति में नमाज नहीं पढ़ सकतीं भारत की मुस्लिम महिलाएं, जानें नियम

नई दिल्ली। भारत का सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 से जुड़े कई महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर सुनवाई की तैयारी कर रहा है। यह दोनों अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों के प्रबंधन से संबंधित हैं। अब चर्चा का एक मुख्य विषय यह बन चुका है कि क्या मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों की तरह मस्जिद के अंदर नमाज पढ़ने का समान अधिकार होना चाहिए?

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दुनिया के कई हिस्सों में अपनाई जाने वाली पारंपरिक इस्लामी प्रथाओं के मुताबिक जब सामूहिक Namaz में पुरुष भी मौजूद होते हैं तो महिलाएं आमतौर पर पहली कतार में खड़ी नहीं होती हैं। इस्लामी विद्वान और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठन यह तर्क देते हैं कि यह व्यवस्था भेदभाव पर आधारित न होकर लंबे समय से चली आ रही धार्मिक रीति रिवाज पर आधारित है।

मौजूदा व्यवस्था के समर्थक अक्सर हदीस का हवाला देते हैं। उनके मुताबिक मिश्रित सामूहिक नमाज के दौरान पुरुषों के लिए आगे की कतार सबसे अच्छी मानी जाती है। वहीं महिलाओं के लिए पीछे की कतार बेहतर मानी जाती है। धार्मिक विद्वानों का यह तर्क है कि यह व्यवस्था इबादत के दौरान अनुशासन और अलगाव बनाए रखने के लिए बनाई गई थी। क्योंकि नमाज का नेतृत्व करने वाले इमाम आगे खड़े होते हैं इस वजह से पारंपरिक रूप से कतारों को इस तरह से व्यवस्थित किया जाता है कि पुरुष आगे और महिलाएं पीछे रहें।

सुनवाई के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अदालत को बताया कि इस्लाम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश करने या फिर नमाज पढ़ने पर रोक नहीं लगाता। हालांकि उसने यह तर्क दिया की नमाज की व्यवस्था से जुड़े कुछ धार्मिक रीति रिवाज इस्लामी परंपरा और आंतरिक धार्मिक प्रबंधन का हिस्सा हैं। बोर्ड ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस्लाम सामूहिक इबादत के दौरान पुरुषों और महिलाओं के बीच बिना किसी रोक-टोक के मेल जोल को हतोत्साहित करता है। यही वजह है कि मस्जिदों के अंदर महिलाओं के लिए अक्सर नमाज की अलग जगह बनाई जाती है।

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