सावन में क्यों निकालते हैं कांवड़ यात्रा? ऐसे हुई इस परंपरा की शुरुआत

डेस्क। सावन के पूरे महीने में ‘बोल बम’ के नारों के साथ लाखों कांवड़िए शिव भक्ति में सराबोर होकर यात्रा में शामिल होते हैं। जैसे ही महीना शुरू होता है, देश की सड़कें केसरिया कपड़े पहने भक्तों के सैलाब से भर जाती हैं। ये श्रद्धालु नंगे पैर मीलों तक चलते हैं और बांस की बनी ‘कांवड़’ में गंगाजल भरकर ले जाते हैं। यह यात्रा सिर्फ एक तीर्थयात्रा नहीं होती है बल्कि भगवान शिव के प्रति गहरी श्रद्धा का भी प्रतीक भी मानी जाती है।

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कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) हिंदू पंचांग के पांचवें महीने सावन में हर साल निकाली जाती है और लाखों की संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं। इस यात्रा का अपना एक इतिहास और कहानी है। इसकी शुरुआत का सीधा संबंध समुद्र मंथन से है। जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तो उसमें से कई अनमोल वस्तुएं निकलीं तब उसमें से एक था ‘हलाहल’ विष।

यह इतना खतरनाक था कि पूरी सृष्टि का विनाश कर सकता था। उस समय भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में समाहित कर लिया और ‘नीलकंठ’ नाम से प्रसिद्द हुए। उनके गले को ठंडक पहुंचाने के लिए माता पार्वती और अन्य देवी-देवताओं ने गंगाजल अर्पित किया जिससे उन्हें शीतलता मिली। इसी पौराणिक कथा का अनुसरण आज भी करते हुए लोग सावन में शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाते हैं।

जब बात कांवड़ यात्रा की आती है तो सबसे पहला कांवड़ परशुराम को माना जाता है क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर महादेव को अर्पित किया था। उसके अलावा प्रभु श्री राम ने भी वैद्यनाथ धाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया और वो भी कांवड़ कहलाए। कांवड़ यात्रा को लेकर कई प्रचलित पात्र जैसे ऋषि परशुराम, भगवान राम और लंका के राजा रावण द्वारा भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करने की कथाएं प्रचलित हैं और उन्हें कांवड़ के रूप में ही देखा जाता है।

सदियों से इन्हीं परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए जैसे-जैसे समय बदलता गया भक्तों से कांवड़ यात्रा को और बड़े स्वरूप में दिखाया। आज लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा में शामिल होते हैं और कावड़ यात्रा के लिए पवित्र जल मुख्य रूप से यात्री हरिद्वार से भरते हैं। इसके अलावा गंगोत्री, गौमुख, सुल्तानगंज और अन्य स्थानीय पवित्र नदियों या गंगा के प्रमुख घाटों से भी भक्त कांवड़ में गंगाजल भरकर लाते हैं और सावन की शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर अर्पित करते हैं।

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