नई दिल्ली। मध्य-पूर्व की दहकती आग के बीच अब एकबार फिर शांति की उम्मीदें इस्लामाबाद (Islamabad) की गलियों में तलाशी जा रही हैं। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे कूटनीतिक तनाव के समाधान के लिए पाकिस्तान एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका में है। इस बीच हम आपको बताते हैं आखिर इस कूटनीतिक मेजबानी का भारी-भरकम बिल कौन भरेगा?
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अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक स्थापित नियम है कि जो देश दो विरोधी पक्षों के बीच शांति वार्ता की मेजबानी करता है, वही उस आयोजन की पूरी जिम्मेदारी उठाता है। इस्लामाबाद के संदर्भ में मेजबान होने के नाते पाकिस्तान सरकार पर इन मेहमानों के ठहरने, आयोजन स्थल की सुरक्षा, अत्याधुनिक लॉजिस्टिक्स और प्रोटोकॉल से जुड़े सभी इंतजामों का वित्तीय बोझ आता है।

पाकिस्तान की सरकार और सेना इस आयोजन को कूटनीतिक सफलता के रूप में देख रहे हैं, जिसके लिए बड़े स्तर पर संसाधनों को जुटाया जा रहा है ताकि वैश्विक पटल पर एक जिम्मेदार और सक्षम मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की छवि को पुख्ता किया जा सके। तकनीकी रूप से, शांति वार्ता का सीधा खर्च मेजबान देश ही उठाता है, लेकिन पर्दे के पीछे के आर्थिक गणित अलग होते हैं।
कई बार ऐसे आयोजनों में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं या रणनीतिक साझेदारों से गुप्त फंड या सब्सिडी की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि अभी तक इस्लामाबाद में होने वाली इस नई वार्ता के लिए आधिकारिक तौर पर किसी अन्य देश से वित्तीय सहायता की बात सामने नहीं आई है। सारी जिम्मेदारियां फिलहाल पाकिस्तान के बजट और उसके सरकारी खजाने पर ही निर्भर करती नजर आ रही हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के कूटनीतिक दबदबे को बनाए रखने का एक जरिया है।
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