डेस्क। भारतीय चुनाव आयोग (ECI) देश में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने वाली सबसे प्रमुख संस्था है। हाल ही में मीडिया रिपोर्ट्स में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की खबरें आने के बाद आयोग के कामकाज और शक्तियों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
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अक्सर लोगों को लगता है कि ‘मुख्य चुनाव आयुक्त’ (Chief Election Commissioner) सबसे शक्तिशाली होते हैं और उनके पास कोई विशेष अधिकार होता है।
लेकिन भारतीय कानून और सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ और ही कहता है।
आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि चुनाव आयोग में फैसला कैसे लिया जाता है।
क्या चुनाव आयुक्तों में कोई छोटा या बड़ा होता है?
सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक T.N. Seshan केस में स्पष्ट कर दिया था कि आयोग के तीनों शीर्ष अधिकारियों—मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों—के पास निर्णय लेने की शक्तियां बिल्कुल बराबर हैं।
- बैठकों की अध्यक्षता:
- मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल “बराबर के सहयोगियों में पहला” (First Among Equals) माना जाता है।
- उनका मुख्य काम बैठकों की अध्यक्षता करना और कामकाज का समन्वय संभालना है।
- समान वोटिंग अधिकार:
- देश में चुनाव कराने, किसी पार्टी के विवाद सुलझाने या किसी नेता पर कार्रवाई करने जैसे सभी मामलों में तीनों कमिश्नरों के पास एक-एक वोट की समान शक्ति होती है।
- वीटो पावर नहीं:
- मुख्य चुनाव आयुक्त के पास कोई विशेष या तानाशाही पावर (वीटो पावर) नहीं होती है, जिससे वे बाकी दोनों कमिश्नरों के सामूहिक निर्णय को अकेले रद्द कर सकें।

क्या कहते हैं नियम?
भारतीय संविधान और चुनाव आयोग से जुड़े नियम आयोग के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत बनाते हैं:
- धारा 17 (सर्वसम्मति और विचार-विमर्श):
- इसके तहत चुनाव से जुड़ा कोई भी नीतिगत फैसला केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की मर्जी से नहीं थोपा जा सकता।
- सभी शिकायतों और प्रस्तावों पर तीनों कमिश्नर मिलकर विचार करते हैं।
- धारा 18(1) (कामकाज का बंटवारा):
- निर्वाचन आयोग को सर्वसम्मति से अपने काम करने के तरीके तय करने और तीनों सदस्यों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा करने का पूरा अधिकार है।
- धारा 18(2) (बराबर वोट):
- यह नियम तीनों सदस्यों को एक समान वोटिंग पावर देता है।
असहमति होने पर कैसे लिया जाता है फैसला?
कई बार ऐसा होता है जब किसी गंभीर मुद्दे पर तीनों कमिश्नरों की राय एक जैसी नहीं होती। ऐसी स्थिति में नियम के अनुसार बहुमत (Majority Rule) से फैसला किया जाता है:
- 2 बनाम 1 का नियम:
- यदि किसी प्रस्ताव या फैसले पर मुख्य चुनाव आयुक्त एक तरफ हों और बाकी दोनों चुनाव आयुक्त उनके खिलाफ हों, तो दोनों चुनाव आयुक्तों की राय ही मान्य होगी।
- आयोग के भीतर कोई भी अंतिम निर्णय कानूनी रूप से 2 बनाम 1 के बहुमत से ही पास माना जाता है।
क्यों हो रही है इस मामले पर चर्चा?
हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और खुलासों के अनुसार, पिछले 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग के भीतर गंभीर मतभेद देखने को मिले हैं। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित रूप से अपनी आपत्ति जताई है।
इस खुलासे के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल शुरू हो गई है।
विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप तथा संवैधानिक प्रक्रियाओं के पालन की मांग कर रहे हैं।
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