नई दिल्ली। बीते 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर मंतर से जब कॉकरोच जनता पार्टी और छात्रों की भीड़ संसद की तरफ कूच करने लगी तो पुलिस को उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज, वॉटर कैनन (water cannon) और आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा। अक्सर बेकाबू प्रदर्शनकारियों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां वॉटर कैनन का इस्तेमाल करती हैं।
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दूर से देखने पर यह सिर्फ तेज रफ्तार का पानी नजर आता है लेकिन असल में इसकी धार किसी घातक हथियार से कम नहीं होती है। वॉटर कैनन का इस्तेमाल शुरुआत में आपातकालीन परिस्थितियों विशेष रूप से आग बुझाने के काम में किया जाता है। इस उपकरण को फायर मॉनीटर की श्रेणी में गिना जाता है। इतिहास की बात करें तो सबसे पहले इस जहाजों और तटीय इमारतों की आग बुझाने के लिए फायरबोट्स पर लगाया गया था।

वॉटर कैनन से निकलने वाले पानी की स्पीड और दबाव आम इस्तेमाल के पानी से कई गुना ज्यादा होता है। घरों में इस्तेमाल होने वाले शावर या फिर नल का दबाव लगभग 3 बार (40 psi) के आसपास रहता है, जबकि वॉटर कैनन से निकलने वाले पानी का प्रेशर 15 से 20 बार (220 से 300 psi) तक पहुंच जाता है। जब इतनी जबरदस्त ताकत के साथ मोटी धार निकलती है तो वह कई किलोमीटर दूर खड़े व्यक्ति को भी पलक झपकते ही जमीन पर पटक सकती है और गंभीर चोट दे सकती है।
इतने भीषण दबाव वाला पानी जब किसी के चेहरे या फिर आंख पर पड़ता है तो आंतरिक अंगों को भारी नुकसान होता है। डॉक्टर्स की मानें तो इतने फोर्स के पानी का हमला आंख की पुतली को फाड़ सकता है, आंख के अंदर खून का रिसाव कर सकता है और रेटिना को स्थायी तौर पर नुकसान पहुंचा सकता है। अगर कोई व्यक्ति 10 मीटर की दूरी से कम पर खड़ा है तो इस पानी फोर्स के झटके से सीधे रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर और सिर में जानलेवा चोट का खतरा होता है।
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