लाइफस्टाइल डेस्क। जब कोई रंगों को सामान्य तरीके से नहीं देख पाता तो उसे कलर ब्लाइंडनेस (Color Blindness) या फिर कलर डिफिशियंसी कहते हैं। रेटिना में दो तरह के सेल्स होते हैं- रॉड्स और कोन्स। रॉड्स जहां केवल लाइट और डार्क को पहचान सकता है। वहीं कोन्स तीन रंगों लाल, हरा और नीले की पहचान करता है और विजन के सेंटर में होता है।
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ऐसे में अगर कोई एक भी कलर कोन मौजूद न हो या काम न कर रहा हो, तो कलर ब्लाइंडनेस की परेशानी होती है। तीनों ही कलर कोन न होना इसका गंभीर रूप है। ऐसे में रोजमर्रा के सिंपल काम भी मुश्किल लग सकते हैं। इस आर्टिकल में हम ऐसे ही कामों को आसान बनाने के तरीके जानेंगे।
कलर ब्लाइंडनेस के लक्षण:
रंगों और ब्राइटनेस को सामान्य रूप में देखने में परेशानी
अलग-अलग शेड के रंगों में अंतर न कर पाना
लाल, हरे, नीले या फिर पीले रंग के साथ ज्यादा दिक्कत होना

ऐसे करें मैनेज:
-ड्राइविंग के दौरान ट्रैफिक सिग्नल पर रंगों को पहचाने की बजाय उनके पॉजीशन या क्रम को याद रखें। खासकर कम लाइट या फिर रात के समय में।
-ग्रॉसरी शॉपिंग के समय भी रंगों को लेकर धोखा हो सकता है, इसलिए आप अपने सूंघने या टच करने की क्षमता का ज्यादा इस्तेमाल करें। आप फलों को सूंघकर यह पता कर सकते हैं कि वो पके हुए हैं या नहीं।
-अगर कुकिंग के समय रेसिपी के रंग में आने वाला बदलाव समझ नहीं आ रहा तो थर्मोमीटर की मदद से जान सकते हैं कि खाना पूरी तरह पक गया है या नहीं। कुकिंग के अलग-अलग स्टेज में रेसिपी का कलर बदलता रहता है। आप मसालों को भी लेबल के साथ ड्रॉवर में अरेंज करें, ज्यादा आसानी होगी।
-वर्कप्लेस में भी आपको कलर ब्लाइंडनेस की वजह से परेशानी पेश आती है तो कंप्यूटर या लैपटॉप पर इस तरह सेटिंग कर सकते हैं जिससे देखने में आपको ज्यादा आसानी हो। कई सारे सॉफ्टवेयर कलर ब्लाइंड के हिसाब से भी डिजाइन किए गए हैं, जिससे काम में मदद मिल सकती है।
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