डेस्क। रमजान के पवित्र महीने के समापन पर पूरी दुनिया की नजरें आसमान की ओर टिकी होती हैं। ‘शव्वाल’ के नए चांद का दीदार ही तय करता है कि ईद (Eid) कब मनाई जाएगी लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईद का चांद दिखने के पीछे एक गहरा खगोलीय विज्ञान काम करता है?
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दरअसल इस्लामिक कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित होता है, जिसमें हर महीने की शुरुआत चांद दिखने पर निर्भर होती है। रमजान का महीना भी चांद देखकर शुरू होता है और इसी तरह ईद-उल-फितर भी तभी मनाई जाती है जब शाव्वाल (इस्लामी महीने) का चांद नजर आता है। इस दिन रोजेदार पूरे महीने के कठिन उपवास (रोज़े) के बाद अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं और जश्न मनाते हैं।

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, रमजान का महीना 29 या 30 दिनों का होता है। 29वें रोजे की शाम को चांद देखने की कोशिश की जाती है। खगोलीय भाषा में चांद की उम्र का मतलब उस समय से है जब से नया चांद निकला हो। वैज्ञानिक रूप से जब चंद्रमा सूरज और पृथ्वी के बीच से गुजरते हुए अपने नए चक्र की शुरुआत करता है तो उसे कंजंक्शन कहा जाता है। इस पल से लेकर सूर्यास्त के समय तक जितने घंटे बीतते हैं, उसे ही चांद की उम्र माना जाता है।
भौगोलिक स्थिति के कारण सबसे पहले ईद का चांद सऊदी अरब या ऑस्ट्रेलिया में दिखाई देने की संभावना अधिक होती है। सऊदी अरब में मौजूद मक्का और मदीना इस्लाम के सबसे पवित्र स्थल हैं, इसलिए दुनिया के कई मुस्लिम देश सऊदी अरब के चांद देखने के फैसले को ही मानते हैं। सऊदी अरब में आमतौर पर सबसे पहले चांद दिखता है और वहां ईद मनाई जाती है।
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